Badki Bahuriya-Hindi Story

कहानी: “बड़की बहुरिया”

Badki Bahuriya-Hindi Stories


गांव के बस स्टैंड पर सरकारी बावन सीटर बस ने अचानक ब्रेक लगाया। चन्द्रो काकी ने अपनी ओढ़नी ठीक की और उतरने के खातिर फाटक की ओर बढ़ गई। उतरी ही थीं कि बस फिर स्टार्ट होने की नाकाम कोशिश करने लगी। ड्राइवर ने भी हार नहीं मानी और बस की ज़िद से ऊपर उठकर जोर से एक्सीलेटर पर ांव मारा और बस फिर गूंज उठी, धुआं छोड़ते हुए आगे बढ़ गई।

चन्द्रो काकी सड़क पार करके अपने गांव की ओर बढ़ने लगी। ‘गांव से बस स्टैंड की दूरी दो ही किलोमीटर तो है, पता नहीं ई आज की चोंचलबाज़ पीढ़ी काहें फटफटिया लिये फिर रही है, हम तो दुई दुई कोश से पानी के माटले लाते थे’- चन्द्रो काकी गहन विचार में डूबते हुए आगे बढ़ रहीं थी। आज पूरे चार महीने बाद शहर गई थी चन्द्रो काकी। भतीजे के बिटवा हुआ है ना तो बस उसी के कपड़े लाने।

थैले में कोई ज्यादा वजन नहीं था दो जोड़ी बच्चे के कपड़ों के अलावा चार समोसे थे। शहर जाते वक्त बड़े वाले पोते-पोतियों ने बड़े चाव से कहा था- ‘माँ हमारे लिए तो बस गरमा गरम समोसे ले आना’। तो दुकान वाले से खोलते तेल के गरमा गरम समोसे चन्द्रो काकी ने अखबार में लिपटवाकर थैली में डलवा लिए थे।

चन्द्रो काकी सफर के पहले पड़ाव पर पहुंच गई थीं, गांव और बस स्टैंड के बीच छोटा सा एक और गांव पड़ता है। गांव की मेड़ के पास पहुंची ही थी कि आवाज़ आई ‘राम राम काकी’।

चन्द्रो काकी ने दाईं ओर देखा तो ईश्वर दर्ज़ी की दुकान आज खुली थी। काकी ने भी कहा ‘राम राम’।

दर्ज़ी ने सौम्य स्वर में कहा ‘काकी आ जा पानी पी ले, थक गई होगी’।
चंद्रो काकी डामर की सड़क से उतरकर दुकान की ओर बढ़ी और बोली ‘पानी तो छोड़ और बता इन दिनों घर की ओर काहें नहीं आया, कुर्ते का नाप देना था मुझे
दर्ज़ी ने उलहाना सिर मत्थे लेते हुए कहा ‘अरे काकी पिछले छः दिनों से तपती बुखार में था, तो कई काम अटक गए’।

चन्द्रो काकी ने कुशलक्षेम पूछते हुए कहा ‘अच्छा, अब तो ठीक है ना’
दर्ज़ी ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘हाँ अब टनाटन हूँ, ताप उतर गया रात को’
चन्द्रो काकी ने फिर कहा- ‘ ठीक है तो मैं फिर बाट जोह रही हूँ, देखती हूँ अबके कब तक आता है’।

दर्ज़ी ने बचाव करते हुए कहा- ‘हाँ काकी बस कल दोपहर ही आया, फीता लेकर’।
चन्द्रो काकी रेतीली सड़क से फिर डामर की सड़क पर चढ़ी और आगे बढ़ गई।
‘कल भी ना आने वाला ये दर्ज़ी,चौहत्तर सावन देखे हैं पूरे…मानस की परख हमें भी है’- काकी बड़बड़ाते हुए चलती जा रही थी।

बालाजी वाला बरगद निकला ही था कि सामने से एक औरत आती दिखाई दी। चन्द्रो काकी ने हाथ से आंखों को ओट दी और धूप से बचते हुए झांका तो सामने अनकोरी नज़र आई। चन्द्रो काकी के ललाट से पसीना गायब हो गया और पपड़ी पड़े होठों पर गीली जीभ ने हल चलाकर काकी को मुस्काने की वजह दे दी।
चन्द्रो काकी और अनकोरी काकी की उम्र में कोई घना फर्क न था। अनकोरी काकी पूरे अस्सी बरस की थी और चन्द्रो काकी अस्सी से छः कम। कहने को तो रिश्ते में अनकोरी काकी जेठानी थी चन्द्रो काकी की, पर दोनों के बीच किसी प्रकार का लोक-लिहाज रूपी पर्दा नहीं था।

अनकोरी काकी पास आई तो चन्द्रो काकी ने मुस्कुराते हुए पूछा ‘कहां का चक्कर है आज डोकरी का, भरी दोपहरी में’
अनकोरी काकी ने आंखों को ओट देते हुए कहा ‘कुण है बाई, मैं तो पहचानी ना’
चन्द्रो काकी ने और पास जाते हुए कहा ‘ओ सयानो मैं हूँ, थ्हारी दौरानी (देवरानी), पहचानी के’
‘ओह! चन्द्रो तू है, मैं सोचूँ पीली लूगड़ी ओढ़े कौन की बहुरिया आ रही है’- अनकोरी काकी ने मंद मंद सी मुस्कान के साथ कहा।
चन्द्रो काकी ने मस्करी करते हुए कहा- ‘हम दोनों क्या बहुरिया से कम हैं, अभी तो बुढापा झलके भी ना है’
अनकोरी काकी ने हंसते हुए कहा ‘ना बाई चन्द्रो, अब वो बात ना रही…दिन कट रहे हैं बस’
चन्द्रो काकी ने पूछा- ‘और बेटे बहू ठीक हैं ना’
अनकोरी काकी ने बरगद के गट्टे की ओर इशारा करते हुए बैठने को कहा। चन्द्रो काकी प्रस्ताव ठुकरा ना पाई और अनकोरी काकी के साथ गट्टे पर बैठ गई।
चन्द्रो काकी को अंदेशा हो गया कि बतलाने का कार्यक्रम लम्बा चलेगा आज।
अनकोरी काकी बोली- ‘कल छुटका आया था, कहने लगा माँ यहां क्या करोगी..चलो मेरे साथ, पर मैंने इतना ही कहा कि जो चौबीस बरस में ना आई बिटवा वो अब क्या आएगी’
अनकोरी काकी ने अनायास पड़े आंसूओं को ओढ़नी से पोंछते हुए आगे कहा ‘चौबीस बरस बीत गए चन्द्रो आज उस बात को पर लगता है जैसे कल ही कि बात हो, बरस बीतने में कितना बखत लागे है चन्द्रो’।

चन्द्रो काकी ने हामी भरते हुए कहा- ‘सही है, पानी सा बह जावे हैं जे बरस भी’
अनकोरी काकी ने चन्द्रो काकी की आंखों में देखकर कहा ‘चौबीस बरस पहले जब बड़का गुज़रा था तो रोने की हिम्मत भी ना बची थी, तीन बच्चों को अकेले पालना खेल थोड़े ही था उस टेम….बड़के का ब्याह चाव से किया था मैंने पर बारह मास बाद ही चल बसा, ऊपर से बहुरिया का तीसरा महीना था’
चन्द्रो काकी को सब पता था पर वो जानती थी कि पुराने घाव कभी नहीं भरते। खासकर तब और कौंध जाते हैं जब आपको दुःख बांटने वाला मिल जाए इसलिए वो चुपचाप सुने जा रही थी।

अनकोरी काकी ने फिर ओढ़नी से चौबीस बरस पुराने जख्म के आंसू पोंछे और कहने लगी- ‘बड़के को गुज़रे दुई महीने हुए थे कि बहुरिया के पीहर वाले आ गए, बोले कि मीना बिटिया को कुछ दिनों के लिए लेने आए हैं…मैंने बिना किसी ना-नुकर के राज़ी राज़ी भेज दिया’
‘बहुरिया के जाने के बाद छुटके को कमाने बाहर भेजा और मझले के साथ मैं पहले खेत का काम करती फिर घर का, बखत के साथ सब सम्भाला था चन्द्रो’, अनकोरी काकी ने कहा।

चन्द्रो काकी ने कहा – ‘कष्ट तो बड़ा ही था पर भुगतना पड़े है, जे ही नियति है’
अनकोरी काकी के आंसू मन के सब्र का बांध तोड़ चुके थे और धारा को तरह बस बहते जा रहे थे।

अनकोरी काकी ने इस बार हाथों को आँसू पोंछने का कष्ट नहीं दिया और आगे बताने लगी- ‘ सब सम्भाल भी लिया था चन्द्रो पर बहुरिया को गए चार महीने बीत गए थे, ना कोई खोज ख़बर पहुंचाई पीहर वालों ने और ना ही चिठ्ठी-पत्री पहुंचाई…तभी एक दिन मझले से मैंने कहा कि जा बहुरिया को ले आ, अब तो बच्चा होने की तारीख़ भी नज़दीक आ रही है…..तो बस मझले को सुबह ही रवाना कर दिया’
चन्द्रो काकी ध्यान से सुन रही थी, बिना किसी टोका-टाकी के।

अनकोरी काकी ने आगे कहा- ‘मंझला वहां पहुंचा तो पीहर वालों ने कहा कि हम नहीं भेजेंगे, बच्चा गिरवाकर कहीं और ब्याह तय कर देंगे, अब क्या करेगी ऊ घर में जाकर..ना खाने का ठिकाना और ना ही सोने का, मंझला उनसे खूब विनती करता रहा पर बहुरिया की भाभियों ने एक ना सुनी। यहां तक कि मझले को बहुरिया की शक्ल भी ना देखने दी। मंझला लौटने को ही था कि चौबारे से दौड़ते हुए आकर बहुरिया ने मझले का कन्धा पकड़ लिया और कुछ ना बोली बस झर झर के आंसू बह रहे थे, एक फ़टी सी चुनरी ओढ़े थी, हाथ में ना कोई कड़ा और पांवों में तलवा कटी हुई चप्पल’
अनकोरी काकी फिर रोने लगी, चन्द्रो काकी ने चुप कराने की कोशिश की तो आंसू की धारा कुछ थमी और वो फिर कहने लगी- शाम ढल गई थी चन्द्रो पर तब तक मंझला न लौट था, मैं ड्योढ़ी पर आंखे गड़ाए चूल्हे के आगे बैठी थी, रोटी-सब्जी की सुध ना थी बस बैठी थी। घण्टा भर बाद धुएं की धुंध में दो सायें नज़र आए, मैं खड़ी हुई… तो देखा मंझला बहुरिया को लेकर आया है।

मैंने बिना कुछ कहे चूल्हे पर दाल चढा दी और गरम गरम फुल्के तैयार करके बहुरिया और मझले को परोस दिया, रोटी खाकर दोनों चुपचाप सो गए’
चन्द्रो काकी बस चुपचाप सुने जा रही थी, बाहरी दुनिया से कटके।

अनकोरी का बोलना जारी था, आगे बोली ‘चन्द्रो, सवेरा हुआ तो बहुरिया मेरे पास आकर फूटफूटकर रोने लगी,मैंने चुप करवाया और कहा कि पगली रोती काहें को है जो लिखा है वो होगा। धीरज रख, टेम थोड़ा कठोर है, सब ठीक हो जाएगा.. पर बहुरिया ना रुकी और बस मुझ से लिपट गई।’

अनकोरी ने लम्बी सांस लेते हुए कहा ‘खैर, तीन महीने बीत गए और बहुरिया ने बिटवा को जन्म दिया..सब खुश थे, खाने को भले कम था पर सुख पूरा था,चन्द्रो। खाने को दाने कम थे पर पूरी गुवाड़ी में शक्करपारे बंटवाए थे उस टेम।
पर तब भी एक समस्या आ खड़ी हुई की बहुरिया के पीहर वाले आएंगे की ना आएंगे, भांजे के कपड़े, बुजर्गों की ओढ़ावन तो करनी ही चाहिए लेकिन करते भी क्या और आखिर बुलाते कैसे उनको’
चन्द्रो काकी ने पल्लू सम्भालते हुए कहा- ‘सही है, उनकी खीझ तो भारी थी’
अनकोरी काकी ने हामी भरते हुए कहा- ‘खीज तो भारी थी,चन्द्रो। पर बहुरिया ने समझदारी बरती, मझले से कहकर शहर से गुड़ की भेली मंगवाई और रामविलास के छोटे लड़के से कहकर चिठ्ठी लिखवाई और भेली पर बंधवाकर पीहर भिजवा दी’
चन्द्रो काकी ने आश्चर्य से पूछा- ‘चिठ्ठी में क्या लिखवाई थी बहुरिया’
अनकोरी काकी ने चन्द्रो काकी ओर देखते हुए कहा- ‘चन्द्रो, चिठ्ठी में बस जे लिखवाया था कि भांजा हुआ है, आओ तो शान और सम्मान से आना वरना मत आना’
चन्द्रो काकी ने उत्साह से पूछा- ‘फिर क्या हुआ, आए पीहर वाले’?
अनकोरी काकी ने कहा- ‘आए भी और गांव के बुजुर्गों की भारी भारी ओढ़ावन भी की। बहुरिया और बच्चे के नाम की ढेर सारी चांदी भी लाए थे। बहुरिया ने हमारी और पीहर वालों की, दोनों की नाक रख ली…तभी तो अगले दिन गांव में चर्चे थे कि अनकोरी की बड़की बहुरिया बहुत सयानी है’
अनकोरी काकी फिर कहने लगी- ‘इस बरस बिटवा पूरे चौबीस बरस का हो गया। अब तू ही बता चन्द्रो, क्या छोड़ के चली जाऊं उस बहुरिया को जो फ़टे चिथड़े को ओढ़कर मुझसे आश लेकर वापस घर लौटी थी। ना चन्द्रो ना, बहुरिया ना है मेरी वो।
बिटवा है हमार, बड़का बिटवा।

चन्द्रो और अनकोरी काकी की आंखें नम थी, समोसे ठंडे हो गए थे। पर शायद इतिहास ठंडा ना पड़ा था, जो आज भी चन्द्रो काकी और अनकोरी काकी की आँखों से छलक रहा था।
– रौनक़ ‘आज़द’

Source : Fb Page : Achchi achchi Batein

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