शहजादा खुदादाद और दरियाबार की शहजादी की कहानी

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उपर्युक्त कहानी के मध्य में एक यात्रा में जैनुस्सनम के दरियाबार देश मे जाने का भी उल्लेख है।

वहाँ की एक चित्ताकर्षक कथा उस ने सुनी थी। वह कथा भी इस जगह कही जाती है। हैरन नगर में एक बड़ा ्रतापी बादशाह था जिसे भगवान ने सब कुछ दे रखा था। किंतु उस के कोई संतान नहीं थी। एक रात को उसे सपने में दिखाई दिया कि एक दिव्य पुरुष उस से कह रहा है, उठ, भगवान तेरी मनोकामना पूरी करेगा। सुबह माली से अपने बाग का एक अनार मँगा कर खाना।

सवेरे नमाज पढ़ने के बाद उस ने माली से अनार मँगाया

और उस में से निकले पचास दाने खाए क्योंकि उस की पचास रानियाँ थीं। इस के बाद वह एक-एक कर सभी के पास गया। ईश्वर की कृपा से एक रानी पीरोज के अलावा उस की सभी रानियाँ गर्भवती हो गईं। बादशाह को इस बात से बड़ी ग्लानि हुई। उसे विश्वास हो गया कि यह रानी बाँझ है। उस ने चाहा कि पीरोज का वध करवा दे किंतु उस के मंत्री ने उसे ऐसा करने से रोका और कहा कि संभव है वह भी गर्भवती हो किंतु उस में गर्भ के लक्षण प्रकट न हुए हों। बादशाह ने कहा, अच्छी बात है। मैं इसका वध नहीं कराऊँगा किंतु इसे अपने पास नहीं रहने दूँगा। मंत्री ने कहा, ठीक है। उसे आप अपने भतीजे सुमेर के पास, जो समारिया देश का हाकिम है, भेज दीजिए।

अतएव बादशाह ने पीरोज को समरिया भेज दिया और साथ ही अपने भतीजे को पत्र लिखा

कि हम अपनी रानी को तुम्हारे पास भेज रहे हैं। यदि उस के कोई पुत्र पैदा हो तो मुझे खबर देना। समरिया में दिन पूरे होने पर पीरोज ने एक पुत्र को जन्म दिया। सुमेर ने सूचना भिजवाई कि रानी के पुत्र हुआ है। बादशाह यह सुन कर खुश हुआ किंतु उस ने पीरोज को वापस नहीं बुलाया। उस ने सुमेर को लिखा कि यहाँ भी भगवान की दया से उनचास रानियों के पुत्र हुए हैं, तुम पीरोज के पुत्र का नाम खुदादाद रखो, उस की पैदायश की सारी रस्में करो और उस की अच्छी शिक्षा का प्रबंध करो, हम यहाँ से उस का सारा खर्चा भेजेंगे।

सुमेर नवजात शिशु का पितृवत पालन करने लगा।

जब खुदादाद बड़ा हुआ तो उसे बाण-विद्या, घुड़सवारी और तत्कालीन सारी विद्याओं, कलाओं की शिक्षा प्रवीण शिक्षकों से दिलाई गई और वह सारी विद्याओं में पारंगत हो गया। अठारहवाँ वर्ष लगते उस का रूप और शरीर ऐसा निखरा कि वह संसार का सबसे रूपवान पुरुष लगने लगा। उस में जवानी का जोश उभरा तो उस ने अपनी माँ से कहा, अगर तुम अनुमति दो तो मैं समरिया से निकल कर अपने बल की परीक्षा लूँ। मेरे पिता हैरन नरेश के बहुत-से शत्रु हो गए हैं। चारों ओर के बादशाह भी हैरन पर आक्रमण करना चाहते हैं। आश्चर्य है कि ऐसे कठिन समय में भी मेरे पिता ने मुझे क्यों नहीं बुलाया और मेरे शौर्य का उस ने लाभ क्यों नहीं उठाया। फिर भी मेरा घर बैठना उचित नहीं है। मेरे पिता ने मुझे नहीं बुलाया तो न सही, मुझे चाहिए कि मैं स्वयं ही उस की सेवा में उपस्थित हूँ। माँ ने उस से कहा, यह तो ठीक है कि देश को शत्रुओं का भय हो तो तुम्हें घर पर नहीं बैठना चाहिए। किंतु तुम अभी प्रतीक्षा करो। शायद वह तुम्हें बुला भेजे। बगैर बुलाए तुम्हारा जाना ठीक नहीं है।

खुदादाद ने कहा, जब राज्य पर ऐसा संकट पड़ा

हो तो बुलावे की प्रतीक्षा करना बेकार बात है। मुझे इस समय इतनी बेचैनी हो रही है कि यदि मैं तुरंत अपने पिता की सेवा में उपस्थित नहीं होता तो शायद जीवित ही न रह सकूँगा। मैं वहाँ अपनी वास्तविकता प्रकट ही नहीं करूँगा। मैं अपने को परेदशी बताऊँगा ओर उस की सेवा करूँगा। मैं तभी यह बात बताऊँगा कि मैं उस का पुत्र हूँ जब वह मेरे शौर्य से प्रभावित हो जाएगा। फिर तो नाराजगी की बात न रहेगी।

किंतु उस की माँ ने उसे जाने की अनुमति नहीं दी।

इस पर वह कुछ दिनों बाद एक सफेद घोड़े पर सवार हो कर शिकार के बहाने निकला और अपने साथ कुछ विश्वस्त साथी भी ले लिए। कुछ ही दिनों में वे सब हैरन पहुँच गए। खुदादाद ने बादशाह के दरबार में प्रवेश पा लिया और जा कर उसे फर्शी सलाम किया। बादशाह ने उस का वैभव और व्यवहार देख कर उसे कृपापूर्वक अपने पास बुलाया और उस का परिचय पूछा। खुदादाद ने कहा, मैं काहिरा नगर का निवासी हूँ और एक अमीर का बेटा हूँ। मैं संसार भ्रमण के लिए अपने देश से निकला हूँ। मैं ने सुना है आप को शत्रुओं ने परेशान कर रखा है। अनुमति हो तो आप के लिए रणक्षेत्र में पदार्पण करूँ। बादशाह इस बात से बड़ा खुश हुआ और उसे अपनी निजी सेना का मुख्य अधिकारी बना दिया।

खुदादाद ने कुछ ही दिनों में उस सेना को सज्जित और शिक्षित कर दिया

और उस के नायकों को भी पारितोषिक और सम्मान दे कर प्रसन्न कर दिया। मंत्रिगण भी उस के व्यवहार से मुग्ध हो गए। दरबार में उस का सम्मान सारे शहजादों और सरदारों से अधिक होने लगा। उस पर बादशाह की कृपा अधिकाधिक हो गई। उस ने सेना का विस्तार और सुप्रबंध किया। यह देख कर राज्य के शत्रुगण भी बगैर लड़े अपने देशों को खिसक गए। बादशाह ने अपने बेटों के प्रशिक्षण का भार भी खुदादाद पर डाल दिया। यद्यपि वह अपने भाइयों में सबसे छोटा था तथापि सब का अधिष्ठाता हो गया। इस बात से शहजादे उस से और भी जलने लगे। वे आपस में कहने लगे कि हमारे बूढ़े पिता को जाने क्या हो गया है कि इस परदेशी को इतना चाहने लगा है कि हम सब पर उस का आदेश चलवा दिया है। उन्होंने एक मत से कहा कि यह स्थिति असह्य है।

वे सलाह करने लगे कि इस परदेशी का क्या किया जाए।

एक ने राय दी कि इसे अकेला पा कर मार डालेंगे। एक अन्य शहजादे ने कहा कि यह ठीक नहीं है, यह बात छुपी न रहेगी और बादशाह हमें कठोरतम दंड देगा। अंत में एक शहजादे की बात सब को सबको पसंद आई। उस की राय थी कि हम लोग इस से शिकार खेलने की अनुमति लें और इस बहाने निकल कर किसी दूर देश को चले जाएँ, इस से हमारे पिता को चिंता होगी और वह खुद ही इसे मरवा डालेगा। इस उपाय पर सारे शहजादे एकमत हो गए और इस योजना को पूरा करने की तैयारी करके लगे। फिर एक दिन उन्होंने खुदादाद से कहा कि हम कल शिकार के लिए जाना चाहते हैं, शाम तक वापस आ जाएँगे। खुदादाद ने अनुमति दे दी। वे लोग तो फिर लौटे ही नहीं। तीसरे दिन बादशाह ने खुदादाद से पूछा कि शहजादे दिखाई नहीं देते, वे कहाँ चले गए।

खुदादाद ने कहा, सरकार, यह सेवक स्वयं इस चिंता में है।

वे मुझ से शिकार की अनुमति ले कर गए थे। आज तीसरा दिन है उनका पता नहीं है। बादशाह को भी चिंता हुई। वह रोज खुदादाद से उनका हाल पूछता और वही उत्तर पाता। अंत में एक दिन उस ने क्रोध में आ कर खुदादाद से कहा, परदेशी, तूने इतना साहस कैसे किया कि शहजादों को शिकार पर भेज दिया और खुद उन के साथ नहीं गया। अब खैरियत इसी में है कि तू खुद उनकी खोज में जा और जहाँ भी मिलें उन्हें ले कर आ। तू उन्हें न लाया तो तेरा सिर उतरवा दूँगा।

खुदादाद बादशाह के क्रोध से डर गया

और कुछ धन ले कर घोड़े पर सवार हो कर चला गया। वह नगर-नगर और गाँव-गाँव उन्हें तलाश करता रहा किंतु वे कहीं नहीं मिले। वह अक्सर विलाप किया करता और कहता, मेरे भाइयो, तुम लोग कहाँ हो? तुम किसी दुश्मन के हाथ में तो नहीं पड़ गए? जब तक तुम नहीं मिलते मैं हैरन वापस नहीं जा सकता और तुम्हारा कहीं पता नहीं है। अब उस ने बस्तियों को छोड़ कर जंगलों में उन्हें ढूँढ़ना शुरू किया। इसी खोज में वह एक गहन वन में जा पहुँचा। उस में काले पत्थर का एक विशाल भवन बना हुआ था। वह जा कर उस महल के नीचे खड़ा हो गया और ऊपर देखने लगा। काफी ऊँचे पर एक खिड़की खुली और एक अत्यंत सुंदर स्त्री, जिसके बाल बिखरे और वस्त्र मैले और फटे थे, धीरे-धीरे कुछ कहने लगी। खुदादाद ने कान लगा कर सुना। वह कह रही थी, ओ मुसाफिर, यहाँ से फौरन भाग जा, नहीं तो इस भवन का स्वामी तेरी दुर्दशा कर डालेगा।

वह महाविकराल नरभक्षी हब्शी है।

उस के पंजे में फँसा हुआ आदमी बचता नहीं। वह परदेशियों को पकड़ लाता है, उन्हें एक अँधेरे तहखाने में बंद कर देता है, फिर उन्हें एक-एक करके भून कर खाता है। खुदादाद ने पूछा, तुम कौन हो? स्त्री बोली, मैं काहिरा की रहनेवाली हूँ। बगदाद जा रही थी। इस वन से निकल रही थी कि यही हब्शी आ गया। इस ने मेरे सेवकों को मार डाला और मुझे इस जगह बंद कर दिया। वह मुझ से भोग करना चाहता है किंतु मैं बचती रही हूँ। आज मैं ने उस की बात नहीं मानी तो वह मुझे मार डालेगा। मैं उस का साथ करने से मर जाना पसंद करती हूँ। किंतु तुम क्यों जान देना चाहते हो? तुम भाग जाओ। वह भटके हुए मुसाफिरों को ढूँढ़ने गया है ताकि अपनी खाद्य सामग्री बढ़ाए। वह आता ही होगा। उस की दृष्टि तीक्ष्ण है, वह बहुत दूर से देख लेता है। तुम चले जाओ।

सुंदरी खुदादाद से यह सब कह ही रही थी

कि वह राक्षस जैसा मनुष्य आ पहुँचा। वह पर्वताकार लगता था और बहुत ऊँचे तुरकी घोड़े पर बैठा था। उस की तलवार इतनी भारी थी कि उस के अलावा किसी और से उठ ही नहीं सकती थी और उस की गदा कई मन की थी। खुदादाद उसे देख कर डर गया और ईश्वर से प्रार्थना करने लगा कि इस राक्षस से बचा। हब्शी ने उसे तलवार निकाले देखा किंतु उसे तुच्छ जान कर अपने हथियार न सँभाले बल्कि चाहता था कि वैसे ही उसे हाथों से पकड़ ले। यह देख कर खुदादाद ने घोड़ा बढ़ाया और उस के घुटने पर एक तलवार की चोट की। घाव खा कर हब्शी ने घोर गर्जन किया और अपनी भारी तलवार निकाल कर खुदादाद पर चलाई। खुदादाद पैंतरा बदल कर बच गया वरना वहीं खीरे की तरह कट जाता। अब खुदादाद ने अपनी गदा इस कौशल और ऐसे कोण से चलाई कि हब्शी का हाथ ही कट कर गिर गया और वह घोड़े से नीचे आ रहा। खुदादाद झपट कर पहुँचा और अपनी तलवार से हब्शी का सिर उस के शरीर से अलग कर दिया।

वह सुंदरी खिड़की से यह युद्ध देख रही थी

और भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि खुदादाद को विजयी बनाए। हब्शी की मृत्यु देख कर खुशी से फूली न समाई और पुकार कर कहने लगी, भगवान की बड़ी दया हुई। अब तुम इसकी कमर से चाबियों का गुच्छा लो और ताला खोल कर मेरे पास आओ।वह विशाल हब्शी किले की सारी कुंजियाँ अपने पास ही रखा करता था। खुदादाद उस के पास आया। वह सुंदरी उस के पैरों पर गिरने को उद्यत हुई किंतु खुदादाद ने उसे बीच ही में उठा लिया। सुंदरी उस की प्रशंसा करने लगी और बोली कि मैं ने तुम्हारे जैसा वीर पुरुष और कोई नहीं देखा। खुदादाद ने उसे अभी तक दूर से देखा था, पास से देखा तो पहले की अपेक्षा वह कहीं अधिक सुंदर दिखाई दी। वे दोनों बैठ कर बातें करने लगे।

वे दोनों बातें कर ही रहे थे कि एक ओर से चिल्लाने का शब्द सुनाई दिया।

खुदादाद ने पूछा, यह आवाज कहाँ से आ रही है और उस का क्या मतलब है? सुंदरी ने कमरे के एक ओर बने हुए दरवाजे की और उँगली उठाई, यानी इशारे से बताया कि आवाज इस दरवाजे के पीछे से आ रही है। और पूछने पर वह बोली, यहाँ एक बड़ा-सा कमरा है। उस हब्शी ने यहाँ बहुत-से मनुष्य कैद कर रखे हैं। नए लोगों को ला कर वह यहीं रखता था और प्रतिदिन वहाँ जा कर एक मनुष्य को चुन कर बाहर लाता था और भून कर खा जाता था।

खुदादाद ने कहा कि मैं उन्हें इस कैद से छुड़ाना चाहता हूँ।

वे दोनों उस दरवाजे के पास गए और विभिन्न कुंजियाँ लगा-लगा कर उसे खोलने का प्रयत्न करने लगे। कई कुंजियाँ लगने से ताला देर तक खड़खड़ाता रहा। अंदर से आनेवाली चीख-पुकार और बढ़ गई। खुदादाद को इस बात पर आश्चर्य हुआ कि यह रोना-पीटना क्यों बढ़ गया है। सुंदरी ने कहा कि ताला खड़खड़ाने से वे समझते हैं कि हब्शी आया है और उनमें से किसी को ले जाएगा। उनकी आवाज भी ऐसी थी जैसे किसी गहरे कुएँ के अंदर से आ रही हो। ताला खुलने पर एक लंबा जीना दिखाई दिया। वे उत्तर कर नीचे गए तो देखा कि एक तंग अँधेरी जगह में सौ के लगभग आदमी पड़े हैं जिनके हाथ-पाँव बँधे हैं। खुदादाद बोला, मित्रो, अब भय त्याग दो। भगवान की दया से मैं ने तुम्हारे शत्रु हब्शी को मार डाला है। वे यह सुन कर बड़े खुश हुए।

खुदादाद ने उन के बंधन खोलने शुरू किए।

जिनके बंधन खुलते थे वे औरों के भी खोलने लगते थे। इस प्रकार अल्प समय ही में सारे लोग मुक्त हो गए। तहखाने से बाहर निकल कर सबने खुदादाद के पाँव चूमे और उसे आशीर्वाद देने लगे। जब वे महल के बाहर खुले प्रकाश में आए तो खुदादाद ने देखा कि उनमें उस के वे सभी भाई हैं जिन्हें वह ढूँढ़ने निकला था। उस ने कहा, भगवान की बड़ी अनुकंपा है कि तुम लोग सही-सलामत हो। तुम्हारे पिता तुम्हारे वियोग में अति कातर हो रहे हैं। तुम लोगों में से तो कोई राक्षस के पेट में नहीं गया? यह कह कर उस ने उन्हें गिना और शेष समूह से अलग कर दिया। सारे शहजादे एक-दूसरे के गले मिले।

खुदादाद ने सुंदरी से पूछ कर हब्शी के भंडार-गृह का पता लगाया

और सब लोगों को भरपेट भोजन कराया। उस ने यह भी देखा कि गोदामों में तरह-तरह की मूल्यवान वस्तुएँ, रत्न, सुगंधियाँ, रेशनी थान, मखमल आदि के ढेर लगे हैं। यह माल हब्शी ने व्यापारियों से लूटा था जिन्हें वह तहखाने के लिए पकड़ लाता था। उस गोदाम में सारे मुक्त बंदियों को ले जा कर खुदादाद ने कहा कि अपना-अपना माल उठा लें। सबने अपनी-अपनी गठरियाँ लीं तो खुदादाद ने शेष वस्तुओं में से भी अधिकांश उन्हें बाँट दीं। किंतु उस ने कहा कि इस सुनसान वन में से तुम लोग इन चीजों को ले कैसे जाओगे। उन्होंने कहा, यह हब्शी हमारे ऊँट और खच्चर भी पकड़ लाता था। वे कहीं बँधे होंगे।

खुदादाद पशुशाला में गया

तो उस ने सैकड़ों ऊँटों और खच्चरों के अलावा शहजादों के घोड़े भी बँधे देखे। उनकी रखवाली हब्शी सेवक करते थे। वे सब इन बंदियों को छूटा देख कर समझ गए कि हमारा हब्शी मालिक मारा गया। वे सब जान बचा कर इधर- उधर भाग गए। खुदादाद ने उन्हें जाने दिया। फिर खुदादाद ने उस सुंदरी से कहा, तुम्हें यह हब्शी कहाँ से लाया था? हम तुम्हें वहीं पहुँचा देंगे। यह हैरन के शहजादे तो तुम्हारे देश को जानते ही होंगे, वही तुम्हें पहुँचा देंगे।

लड़की बोली, यह मैं पहले ही बता चुकी हूँ कि मैं काहिरा की रहनेवाली हूँ।

तुमने मेरी जान और इज्जत बचाई, इस के लिए तुम्हारी अति आभारी हूँ। मैं अपना और हाल क्या बताऊँ। बस इतना काफी है कि मैं भी एक शहजादी हूँ। एक दुष्ट ने मेरे पिता को मार डाला और उस के देश को लूट लिया। मैं वहाँ से भागी और यहाँ आ कर इस राक्षस जैसे हब्शी के हाथ पड़ गई। इस पर खुदादाद तथा अन्य शहजादों ने जोर दिया तो वह अपना विस्तृत वृत्तांत इस प्रकार बताने लगी।

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