Ganeem Aur Fitna Ki Kahani-Alif Laila Hindi me

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Ganeem Aur Fitna Ki Kahani-Alif Laila Hindi me – गनीम और फितना की कहानी – अलिफ लैला p-page presents ganeem aur fitna ki kahani hindi me laif laila ki kahani .

Ganeem Aur Fitna Ki Kahani-Alif Laila Hindi me
गनीम और फितना की कहानी – अलिफ लैला

दुनियाजाद ने मलिका शहरजाद से नई कहानी सुनाने को कहा

और बादशाह शहरजाद ने भी अपनी मौन स्वीकृति दे दी तो शहरजाद ने नई कहानी शुरू कर दी। उसने कहा कि ुराने जमाने में दमिश्क नगर में एक व्यापारी रहता था जिसका नाम अय्यूब था। उसके दो ही संतानें थीं, एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र का नाम था गनीम और पुत्री का अलकिंत। पुत्री अत्यंत रूपवती और गुणवंती थी और उसे जो भी देखता उस पर मुग्ध हो जाता। कुछ समय के बाद अय्यूब बीमार पड़ा और उस बीमारी से उबर न सका। गनीम अभी बिल्कुल नौजवान था। पिता का पूर्णरूपेण अंतिम संस्कार करने के बाद उसने व्यापार वस्तुओं तथा संपत्ति को सँभालना शुरू किया।

उसने अपने पिता के गोदाम में जा कर देखा कि बहुत-सी गाँठें हैं

जिन पर बड़े बड़े अक्षरों में बगदाद लिखा है। उसकी समझ में कुछ न आया और उसने अपनी माँ से पूछा कि गठरियों और गाँठों पर बगदाद क्यों लिखा है। माँ ने उत्तर दिया, बेटे, तुम्हारे पिता का हर काम बड़ा व्यवस्थित होता था। जिस चीज को जहाँ जा कर बेचना चाहते थे उसकी गाँठ पर उस स्थान का नाम लिख देते थे ताकि व्यापार यात्रा करते समय हर चीज को खोल कर देखने की जरूरत न पड़े और समय का अपव्यय या गड़बड़ी की संभावना न हो। जिन गाँठों पर बगदाद लिखा है उन्हें वे बगदाद जा कर बेचना चाहते थे। किंतु इस व्यापार यात्रा पर जाने के पहले ही वे महायात्रा पर चले गए। बगदाद की यात्रा न हो सकी और बगदाद में बेची जाने वाली वस्तुएँ यहीं धरी रह गईं। यह कह कर वह अपने पति की याद में रोने लगी। गनीम ने उस समय माता की दशा देख कर कुछ कहना उचित न समझा।

किंतु यह बात उसके मन में बैठी रही

और एक दिन उचित अवसर पा कर उसने माँ से कहा, पिताजी का छोड़ा हुआ काम मैं पूरा करूँगा। वे यह माल बगदाद नहीं ले जा सके, इसे मैं वहाँ ले जा कर बेचूँगा। उसकी माँ यह बात सुन कर बड़ी दुखी हुई और बोली, बेटा, अभी तुम्हारी उम्र कम है। तुम इतनी लंबी यात्रा के योग्य नहीं हो। अभी तो मैं तुम्हारे पिता के रंज ही से उबर नहीं पाई हूँ फिर तुम भी अपने बिछोह का दुख मुझे देना चाहते हो। तुम यात्रा का विचार दिल से निकाल दो। कम मुनाफे पर यह चीजें यहीं दमिश्क के व्यापारियों के हाथ बेच दो। इस लंबी यात्रा में तुम पर बड़ी मुसीबतें पड़ेगीं। मुझे यह मंजूर है कि थोड़ी आय में जीवन यापन करें, तुम्हें किसी प्रकार का दुख हो यह मुझे मंजूर नहीं।

किंतु गनीम पर अपनी माँ के समझाने-बुझाने का कोई असर नहीं हुआ।

वह अपनी बात पर अड़ा रहा और कहने लगा कि मैं कब तक घर में घुसा रहूँगा, मुझे भी तो बाहर जा कर व्यापार करने का अनुभव होना चाहिए। उसकी बात गलत नहीं थी। माल काफी था और उसके विक्रय से अच्छा मुनाफा होने की आशा थी। माँ उसे रोकती ही रह गई और वह रुपया ले कर दमिश्क के बाजार को चल दिया। वहाँ उसने अपना माल सँभालने के लिए कुछ दास खरीदे और सौ ऊँट। उन्हीं दिनों पाँच-छह व्यापारियों का एक काफिला बगदाद को जा रहा था। गनीम ने अपना माल ऊँटों पर लदवाया और इस काफिले के साथ बगदाद शहर की ओर चल पड़ा। यात्रा लंबी थी। मार्ग में सभी लोग थक गए। कई दिन बाद दूर से बगदाद नगर दिखाई दिया। उसे देख कर सब लोग अपनी थकन भूल गए।

दूसरे दिन काफिले ने विशाल नगर बगदाद में प्रवेश किया।

वे सब लोग एक बड़ी सराय में उतरे। गनीम ने अपना माल उस सराय में उतार दिया किंतु स्वयं उस भीड़भाड़ में नहीं रहना चाहा। उसने एक अच्छा मकान किराए पर लिया जिसमें एक सुंदर बाग भी था। वह यात्रा में बहुत थक गया था इसलिए उसने कुछ दिन तक मकान में रह कर आराम किया। जब रास्ते की थकान बिल्कुल जाती रही तो उसने नए कपड़े पहने और वहाँ के व्यापारियों से मिलने के लिए उस जगह को चल दिया जहाँ वे लोग व्यापार की बातें करने के लिए एकत्र होते थे। वह अपने साथ अपने माल के नमूने भी दो दासों के सिरों पर लदवा कर ले गया। व्यापारी उसके पिता को अच्छी तरह जानते थे, उन्होंने उसका प्रेमपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उसके लाए हुए कपड़ों के नमूने भी पसंद किए और उसका सारा माल खरीद लिया। गनीम को अप्रत्याशित लाभ हुआ। उसने अपना सारा दूसरा माल भी उसी दिन बेच दिया, सिर्फ एक गाँठ बचा ली।

दूसरे दिन अपने घर से निकल कर वह बाजार की सैर करने निकला

तो उसे यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि सारी दुकाने बंद थीं। उसने आसपास के लोगों से पूछा कि आज बाजार बंद क्यों है। उसे बताया गया कि अमुख व्यापारी, जो यहाँ के व्यापारियों में सबसे धनी था, आज सबेरे मर गया है। गनीम ने उचित समझा कि उसके अंतिम संस्कार में शामिल हो। उसने पूरा विवरण पूछा तो लोगों ने उसे बताया कि फलाँ मसजिद में नमाज पढ़ी जाएगी फिर जनाजा शहर से दूर बड़े कब्रिस्तान में ले जाया जाएगा। गनीम ने अपने दासों को सराय में वापस भेजा और मसजिद को चल दिया। वहाँ जा कर वह लोगों के साथ नमाज में सम्मिलित हुआ और फिर उसकी अर्थी के साथ कब्रिस्तान को चल दिया।

कब्रिस्तान शहर से काफी दूर था।

वहाँ जा कर उसने देखा कि व्यापारी के लिए पहले से कब्र खुदी हुई है और कब्र को पक्का करने के लिए उत्तम प्रस्तर शिलाएँ और कब्र बनाने का सामान, राज मजदूर आदि सभी मौजूद हैं और कब्र के चारों ओर बहुत-से खेमे खड़े किए गए हैं। वहाँ पहुँच कर व्यापारी लोग उन डेरों में जा कर कुरान का पाठ करने लगे। फिर जब लाश को कब्र में उतार कर कब्र को ढक दिया गया तो सभी व्यापारी आसपास जमा हो कर फातिहा पढ़ने लगे और बहुत देर तक पढ़ते रहे। यहाँ तक कि रात पड़ने लगी। उसे आश्चर्य हुआ कि इतनी देर क्यों लगाई जा रही है। उसके पूछने पर लोगों ने बताया कि जब कोई बड़ा आदमी मरता है और उसकी अर्थी के साथ बहुत-से आदमी होते हैं तो उस रात को सब लोग कब्रिस्तान ही में ठहरते हैं, सब लोगों का यहीं खाना-पीना होता है और सब लोग दूसरे दिन अपने-अपने घरों को वापस होते हैं। उसे यह भी मालूम हुआ कि रात को होनेवाले मृतक संस्कार भोज में शामिल होना जरूरी है, यह वहाँ की रस्म है और सब लोग इस पर जोर देते हैं।

अतएव गनीम को रात के भोज में शामिल होने के लिए रुकना पड़ा

किंतु वह थोड़ा-बहुत खा-पी कर वहाँ से चुपचाप शहर की ओर चल दिया। उसने सोचा कि घर खाली देख कर कहीं चोर घुस कर मेरा धन न लूट ले जाएँ या ऐसा न हो कि मेरे दास ही बेईमानी करें और मेरा धन ले कर रफूचक्कर हो जाएँ। वह बगैर किसी को बताए आया था इसलिए किसी से रास्ता भी ठीक तरह नहीं पूछ सका था। वह दिन भर का थका था, चोरी के विचार से परेशान था और रास्तों से अच्छी तरह परिचित भी नहीं था। फलस्वरूप वह अँधेरे में बुरी तरह भटक गया और उसे किसी प्रकार वह मार्ग न मिला जिस पर चल कर वह घर पहुँचे। काफी भटकने के बाद जब वह नगर के मुख्य द्वार पर पहुँचा तो आधी रात हो गई थी और द्वार बंद हो गया था। उसकी अनुनय-विनय के बावजूद द्वारपालों ने फाटक नहीं खोला। उसे अफसोस होने लगा कि बेकार ही व्यापरियों का साथ छोड़ कर शहर की ओर आया।

अब वह रात बिताने के लिए शहर से बाहर कोई स्थान खोजने लगा।

कुछ देर बाद उसे शहर के पास ही एक छोटा-सा कब्रिस्तान दिखाई दिया। वह वहीं चला गया कि किसी कब्र पर लेट कर रात बिताए। वह उसके अंदर चला गया और एक जगह घास उगी हुई देखी तो वहीं पर लेट गया। वह सोना चाहता था किंतु स्थान की भयानकता के कारण उसे नींद नहीं आ रही थी। वह घबरा कर उठ खड़ा हुआ और कब्रिस्तान की दीवार के पास टहलने लगा।

अचानक उसने देखा कि एक प्रकाश बिंदु उसकी ओर आ रहा है।

वह प्रेतबाधा के डर से एक घने वृक्ष पर चढ़ गया और उसकी शाखाओं के बीच छुप कर बैठ गया। उसने देखा कि आनेवाले तीन आदमी हैं जो राजमहल के सेवकों जैसे कपड़े पहने हैं। आगे का आदमी मशाल लिए आ रहा था और उसके पीछे दो व्यक्ति एक लंबा संदूक उठाए हुए ला रहे थे। एक जगह संदूक उतार कर संदूक ढोनेवालों में से एक ने कहा, भाइयो, मुझे तो बड़ा भय लग रहा है, यहाँ ठहरने को भी जी नहीं करता। मेरी मानो तो इस संदूक को यूँ ही छोड़ कर भाग चलो। आगे आनेवालों ने, जो सेवकों का प्रधान मालूम होता था, उसे डाँटा, क्या बकवास कर रहा है? क्या मालकिन ने स्पष्ट रूप से आज्ञा नहीं दी थी कि संदूक को कब्र में गाड़ कर आना? अगर उसे मालूम हुआ कि संदूक गाड़ा नहीं गया है तो वह हम लोगों की खाल खिंचवा देगी।

फिर तीनों ने फावड़ा उठाया और संदूक को गाड़ने के लिए गढ़ा खोदने लगे।

उन्होंने इतना गहरा गढ़ा शीघ्र ही खोद डाला जिसमें वह संदूक आसानी से समा जाए। संदूक को गढ़े में उतार कर उन्होंने उसके ऊपर मिट्टी पाट दी और फिर वापस चले गए। गनीम ने सोचा कि संभवतः संदूक में धन-दौलत होगी जिसे सुरक्षित रखने के लिए किसी स्त्री ने कब्रिस्तान में गड़वा दिया है। आदमियों के जाने के बाद वह पेड़ से उतरा और उसने मिट्टी हटा कर संदूक को देखा। मिट्टी उसी समय पड़ी थी इसलिए उसे हटाने में तो दिक्कत न हुई लेकिन संदूक भारी था, उसे न निकाल सका। उसने देखा कि संदूक में ताला भी लगा है। उसने दो पत्थर उठाए और उनकी मदद से ताला तोड़ दिया। जब उसने संदूक का ढक्कन उठाया तो देखा कि उसमें रुपए- पैसे के बजाय एक सुंदर तरुणी लेटी हुई है। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

पहले वह समझा कि वह सो रही है क्योंकि उसकी साँस चल रही थी।

किंतु फिर उसने सोचा कि अगर वह सो रही होती तो ताला टूटने की आवाज से जाग जाती, वह जरूर बेहोश होगी। उसने देखा कि उसके जेवरों में बहुमूल्य हीरे जड़े हैं। वह समझ गया कि यह खलीफा के महल की स्त्री होगी। उसके सौंदर्य ने उस पर जादू-सा डाल दिया और वह यह भी न कर सका कि उसे छोड़ कर यूँ ही भाग जाए। उसने उस सुंदरी को संदूक से उठाया और बाहर घास पर लिटा दिया। हाँ, इसके पहले उसने जा कर कब्रिस्तान का द्वार बंद कर दिया जिसे सेवक खुला छोड़ गए थे।

जब उस स्त्री को ठंडी हवा लगी तो उसके हाथ-पाँव हिलने लगे

और कुछ देर में उसने थोड़ी-थोड़ी आँखें खोलीं और क्षीण स्वर में आवाज दे कर कहने लगी, अरी जोहरा, बोस्तान, शाहसफरा, अम्रकला, कासा बोस, नूरुन्निहार, तुम सब की सब कहाँ मर गईं। स्पष्ट था कि वह अपनी दासियों को आवाज दे रही थी और वे दासियाँ रात-दिन उसकी सेवा में लगी रहने वाली थीं। गनीम को खुशी हुई कि ऐसी अतीव सुंदरी को उसने कब्र में जिंदा ही मर जाने से बचा लिया। जब स्त्री ने देखा कि उसकी आवाज पर कोई नहीं आया तो उसने आँखें खोल कर देखा और घबरा कर चिल्ला उठी, क्या बात है? यहाँ इतनी कब्रें कैसी हैं? क्या कयामत आ गई है और मैं अपनी कब्र से उठी हूँ? लेकिन कयामत में तो दिन होता है, यह रात में कयामत कैसे आ गई?

अब गनीम उसके सामने जा कर बोला, इत्मीनान रखिए।

अभी कयामत नहीं आई है। मैं परदेसी हूँ। भगवान को आप के प्राणों की रक्षा करनी थी इसलिए कब्र खोद कर आपको निकालने के लिए मुझे यहाँ भेज दिया। अब बताइए, आप की क्या सेवा करूँ। स्त्री बोली, पहले यह बताइए कि मैं यहाँ कैसे पहुँची और कौन मुझे यहाँ लाया।

गनीम ने सारी घटना कह सुनाई।

वह स्त्री उठ बैठी और सिर ढक कर बोली, सच है कि भगवान ने मेरी प्राणरक्षा के लिए आप को यहाँ भेजा था। वरना तो मेरे मरने में संदेह ही नहीं था। अब आप ऐसा करें कि सवेरा होने से पहले मुझे उसी संदूक में बंद करें और सेवेरे शहर जा कर किराए पर एक खच्चर लाएँ और उसकी पीठ पर मेरे समेत यह संदूक लाद कर अपने घर ले चलें। फिर मैं आप को सारा किस्सा बताऊँगी। मैं आप के साथ पैदल भी चल सकती थी किंतु इन वस्त्राभूषणों में मुझे शहर के लोग पहचान लेंगे और फिर मैं और आप दोनों मुसीबत में फँस जाएँगे।

गनीम ने संदूक बाहर निकाल कर

उसकी मिट्टी वगैरह साफ की और उसे गढ़े में रखा। सुंदरी उसमें लेटी रही। गनीम ने संदूक का ढकना इस तरह बंद किया कि उसमें हवा आती-जाती रहे। सुबह होने पर गनीम शहर गया और एक खच्चरवाले से उसका खच्चर किराए पर माँगा। खच्चरवाले के पूछने पर उसने कहा, कल मैं अपने माल का संदूक ले कर एक खच्चर पर लदवा कर बाहर जा रहा था किंतु उस खच्चरवाले को कोई और अच्छी कीमत देनेवाला मिल गया और वह मेरा संदूक कब्रिस्तान में पटक कर चल दिया। अब मैं वह अपने घर लाना चाहता हूँ। खच्चरवाला उसके साथ कब्रिस्तान आया और संदूक खच्चर पर रख कर गनीम के घर पहुँचा दिया।

घर आ कर गनीम ने अपने एक गुलाम से दरवाजा बंद करने को कहा।

फिर संदूक से उस युवती को निकाला और उसका हाल पूछा कि कैसी तबीयत है। उसने उत्तर दिया कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ। फिर गनीम एक गुलाम को ले कर घर से निकला और बाजार में जा कर अपने हाथ से उत्तमोत्तम खाद्य पदार्थ तथा बादशाहों के पीने योग्य मदिरा खरीदी।

इसके अलावा अच्छे फल, मिठाइयाँ आदि भी खरीदीं। घर आ कर सारी खाद्य सामग्री थालियों में सजा कर उस सुंदरी के पास ले गया। किंतु उसने कहा कि मैं अकेले नहीं खाऊँगी, तुम भी साथ में बैठ कर खाओ। गनीम विवश हो कर उसके पास बैठ गया।

खाने के पहले उस सुंदरी ने अपने चेहरे से नकाब उतारा और एक तरफ रख दिया।

गनीम की नजर उस पर पड़ी तो वह चौंक उठा। उसमें अंदर की तरफ रेशमी धागे से कढ़ा हुआ था, मैं खलीफा हारूँ रशीद की प्रेयसी हूँ और वह मेरा है। गनीम यह देख कर बहुत घबराया कि यह किस मुसीबत को मैं अपने घर ले आया। उसने नम्रतापूर्वक पूछा, सुंदरी, अब तुम मुझे अपने बारे में बताओ कि कौन हो और कैसे कब्रिस्तान में पहुँची।

उसने कहा, मेरा नाम फितना है। मैं खलीफा हारूँ रशीद की प्रेयसी हूँ।

मैं अपने बचपन ही से दासी के रूप में खलीफा के महल में आ गई थी। मुझे वहाँ अच्छी शिक्षा मिली और कुछ दिनों ही में मैं सारी कलाओं और विद्याओं में निपुण हो गई। खलीफा ने मेरे उभरते रूप और गुणों को देखा तो मुझसे प्यार करने लगा। उसने एक बड़ा मकान मेरे लिए बनवा दिया और बीस दास-दासियाँ मेरी सेवा के लिए नियुक्त किए। उसने मुझे इतना धन दिया कि मैं शहजादियों जैसी शान-शौकत से रहने लगी। खलीफा की विवाहिता रानी जुबैदा है। वह मेरे प्रति खलीफा के बढ़े हुए प्रेम को देख कर जलने लगी। उसने इरादा कर लिया कि किसी तरह मुझे मरवा दे। मैं होशियार रहती थी इसलिए मलिका जुबैदा की कोई चाल न चल सकी। इधर की तरफ खलीफा को किसी शत्रु से निपटने के लिए काफी दिन के लिए बाहर जाना चाहा। जुबैदा ने उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाया। उसने मेरी एक दासी को भारी इनाम दे कर तोड़ लिया। उस नमकहराम दासी ने कल रात को शरबत में मुझे बेहोशी की दवा दे दी। जब मैं बेहोश हो गई तो उसने मुझे इस ताबूत में बंद कर दिया। रानी के सेवक आ कर मुझे ले गए और जीते जी ही कब्र गाड़ आए। किंतु भगवान को मंजूर था कि मुझे अभी जीवित रखे इसलिए उसने तुम्हें उस कब्रिस्तान में पहले ही से पहुँचा दिया। तुमने मुझे बचा लिया लेकिन अपनी मौत का सामान कर लिया। कोई चमत्कार ही हो तो तुम बच सकोगे।

गनीम यह सुन कर और घबराया और पूछने लगा

कि मुझे किस अपराध पर मारा जाएगा। फितना बोली, अगर जुबैदा को मालूम होगा कि तुमने मुझे बचाया है तो वह तुम्हें और मुझे दोनों को मरवा डालेगी। अगर उसे न मालूम हुआ तो खलीफा युद्ध से वापस आने पर मेरी कब्र पर जाएगा और वहाँ मेरा ताबूत न पा कर सारे नगर बल्कि देश-देशांतर में मेरी खोज करवाएगा। जब उसे मालूम होगा कि तुमने मुझे अपने मकान में रखा है तब वह तुम्हें मरवा देगा। गनीम ने कहा, मतलब यह कि मैं किसी तरह बच नहीं सकता। फितना ने कहा, इतना निराश होने की भी जरूरत नहीं है। जब तक घर के लोग ही भेद न दें कोई किसी और का हाल कैसे जान सकेगा। गनीम ने कहा, यहाँ तो कोई भेद देनेवाला नहीं है। पहले तो मेरे दासों की किसी से जान-पहचान भी नहीं है कि उस पर तुम्हारा भेद प्रकट करें। फिर सभी लोग जानते हैं कि धनवान अविवाहित पुरुष अपने पास रखैलें रखते हैं, तुम्हें भी यह लोग यही समझेंगे।

इतना इत्मीनान होने के बावजूद गनीम इस बात का ध्यान रखता

कि उसके अपने दास फितना के सामने जहाँ तक हो सके न आएँ। उपर्युक्त बातचीत के बाद एक दास ने दरवाजा खटखटाया तो गनीम स्वयं बाहर आया। दास उसकी आज्ञानुसार बाजार से भोजन सामग्री लाया था। गनीम ने सारी चीजें उसके हाथ से खुद ले कर फितना के सामने रखीं। उससे कहा, तुम यहाँ खाओ पियो, मैं अभी आता हूँ। यह कह कर वह बाजार गया और फितना के लिए दो दासियाँ और उत्तमोत्तम वस्त्राभूषण ले आया। फितना इन्हें पा कर बहुत खुश हुई और बोली, वाह मेरे मालिक, आप मेरा इतना खयाल रखते हैं। गनीम ने कहा, मेरे लिए ऐसा संबोधन न करो। मैं इतने सम्मान के योग्य नहीं हूँ। मैं तो तुम्हारे सेवक जैसा हूँ।

फितना बोली, यह आप क्या कहते हैं। मैं तो आपको मालिक से भी बढ़ कर कुछ कहूँ तो उचित होगा। आपने भयंकर मृत्यु से मेरी रक्षा की है। मैं कितना कुछ भी करूँ सारे जीवन आपका अहसान नहीं उतार सकती। मेरी दशा में यह कैसे संभव है कि मैं आपको अपने दास जैसा समझूँ। गनीम यह सुन कर मुस्कुरा कर रह गया।

गनीम और फितना दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगे थे,

फिर भी दोनों को मालूम था कि मर्यादा के बंधन उनका शारीरिक संबंध न होने देंगे। कारण यह था कि फितना खलीफा की संपत्ति थी और बादशाह की संपत्ति का उपयोग कोई प्रजाजन नहीं कर सकता। शाम होने पर गनीम ने घर के अंदर दीये जलवाए और भूमि पर स्वच्छ चादरें बिछा कर उस पर बढ़िया शराब और फल ला कर रखे। बगदादवासियों की साधारण रीति यह थी कि दिन में रोटी, मांस आदि ठोस पदार्थ खाते थे और रात को केवल फल खाते थे और शराब पीते थे। जब दोनों ने दो-दो तीन-तीन पात्र मदिरा के पी लिए तो इन्हें नशा चढ़ने लगा और उन्होंने मस्ती में गाना शुरू कर दिया। पहले गनीम ने सद्यःरचित श्रृंगारिक गीत सुनाए। फिर फितना ने भी इसी प्रकार सद्यःरचित गीत सुनाए। काफी देर तक वे एक-दूसरे के बाद इसी तरह गाते रहे।

जब काफी रात बीत गई

तो गनीम फितना को एक कमरे में सुला कर स्वयं दूसरी जगह जा कर सो रहा। अब उन दोनों की दिनचर्या यही हो गई थी। वे दिन भर एक-दूसरे के साथ रह कर आनंदित होते थे और रात को अलग-अलग जा कर सोए रहते थे। इसी प्रकार उनके दिन बीतने लगे। गनीम ने इतना प्रबंध कर के समझ लिया कि वे दोनों सुरक्षित हें। वे दोनों एक- दूसरे की प्रीति में डूबे रहे और अपनी अनुभवहीनता से यह भी न सोच सके कि उन्हें वेश बदल कर बगदाद छोड़ देना चाहिए।

वैसे तो बगदाद में किसी को नहीं मालूम था

कि खलीफा की प्रेयसी फितना कहाँ गई। फिर भी रानी जुबैदा परेशान रहती थी कि अगर किसी तरह फितना की खोज शुरू हुई तो वह स्वयं खलीफा के संदेह से किस प्रकार बच सकेगी। बहुत सोच-विचार कर उसने एक बूढ़ी दासी को बुलाया। इस दासी ने जुबैदा को बचपन में गोद खिलाया था। वह दासी से बोली, अम्मा, तुम्हें मालूम है कि जब मैं किसी कठिनाई में फँसती हूँ तब तुम्हीं से सहायता लेती हूँ। तुम मेरा कष्ट सुन कर ठंडे दिमाग से उस पर विचार करती हो। तुम्हारे जैसी चतुर स्त्री मैंने कोई नहीं देखी और तुम्हारे पास प्रत्येक संकट से उबरने का उपाय है। इस समय मुझे एक ऐसी चिंता लगी है जिससे मेरी नींद हराम हो गई है। बुढ़िया ने पूछा, बेटी, ऐसी क्या बात है? जुबैदा ने उसे पूरा किस्सा बताया, मैंने फितना को बेहोशी की दवा दिलवा कर कुछ आदमियों के द्वारा एक छोटे कब्रिस्तान में जिंदा गड़वा दिया है, अब इस बात पर कैसे परदा डालूँ। उसे वीरान कब्रिस्तान में गड़वाया ही इसलिए है कि उसका पता किसी को न चले किंतु खलीफा उसे बहुत प्यार करता है और युद्ध से लौट कर वह उसकी खोज जरूर करवाएगा और अगर भेद खुल गया तो मुझे अपनी प्रतिष्ठा बचाना कठिन हो जाएगा।

बुढ़िया बड़ी खुर्राट थी। उसने कहा, बेटी, तुम बिल्कुल चिंता न करो। यह कौन बड़ी बात है? मैं ऐसी तरकीब बताऊँगी कि किसी को इस मामले में तनिक भी संदेह न हो सकेगा। खलीफा तुम पर कोई संदेह नहीं करेंगे। जुबैदा ने कहा, अम्मा, ऐसा क्या उपाय हो सकता है।

बुढ़िया बोली, बताती हूँ।

तुम कारीगर से एक बड़ा-सा लकड़ी का पुतला बनवाओ, उसकी ऊँचाई औरतों जैसी होनी चाहिए। मैं उस पर पुराने कपड़े लपेट दूँगी। फिर एक ताबूत मँगवा कर उसमें वही पुतला रख देना और तुरंत ही शाही कब्रिस्तान में गड़वा देना। इतना ही नहीं, कब्र के ऊपर एक आलीशान मकबरा भी बनवा देना और उस मकबरे में फितना का एक बड़ा-सा चित्र टँगवा देना। कब्र पर रोज बहुत ही दीये जलवाया करना। कभी-कभी तुम और तुम्हारी दासियाँ काले कपड़े पहन कर मकबरे पर जाया करें और वहाँ जा कर फितना के लिए मातम किया करें। फितना की अपनी दासियों तो रोजाना काले कपड़े पहन कर फितना के लिए मातम करने को उसके मकबरे पर काले कपड़े पहन कर जाया ही करेंगी। खलीफा जिस दिन आने को हो उस दिन तुम विशेष रूप से मातम करने के लिए जाना। खलीफा यह देख कर तुमसे जरूर पूछेंगे कि काले कपड़े क्यों पहने हो। तुम कहना कि तुम्हारी प्रेयसी और मेरी प्यारी सखी फितना का निधन हो गया है, उसी के मातम में मैंने यह कपड़े पहने हैं। यह सुन कर खलीफा को बहुत दुख होगा किंतु वह रो-पीट कर बैठ जाएगा।

जुबैदा ने कहा, अगर कहीं खलीफा ने फितना की कब्र खुदवा कर

उसका अंतिम दर्शन करना चाहा तब तो भेद खुल ही जाएगा और मैं झूठी पड़ जाऊँगी। बुढ़िया ने कहा, ऐसा नहीं हो सकता। हमारे इस्लाम धर्म के अनुसार कोई कब्र खुलवाई नहीं जा सकती। फिर फितना खलीफा की कितनी ही प्यारी क्यों न हो, थी तो उसकी दासी ही। दासी के लिए कौन बादशाह इतना झंझट करता है कि धार्मिक नियमों का भी उल्लंघन कर दे। अब तुम पुतला जल्दी बनवाओ, बल्कि तुम भी यह झंझट न करो। मैं स्वयं एक अच्छे और विश्वस्त कारीगर को जानती हूँ। वह तुरंत ही इस काम को कर देगा।

बुढ़िया ने फिर कहा, तुम्हें एक काम सावधानी से करना होगा।

तुम उसी दासी को बुलाओ जिसने तुम्हारे कहने पर फितना को शरबत में बेहोशी की दवा दी थी। उसे आदेश देना कि वह फितना के सेवकों तथा अन्य राज कर्मचारियों में यह बात प्रसिद्ध कर दे कि उसने एक सुबह फितना को उसके बिस्तर में मरा पाया है। यह भी जरूरी है कि जिस दिन तुम अपनी तैयारी पूरी करके उसे आदेश दो उसी दिन वह फितना की मौत की खबर फैलाए और किसी को फितना के कमरे में प्रवेश करने की अनुमति न दे। तुम तुरंत राजमहल के मुख्य प्रबंधक हब्शी मसरूर को बुला कर राजकीय शोक का आदेश दे देना और ताबूत मय पुतले के फितना के कमरे में भेज कर उसे समारोहपूर्वक बाहर निकलवाना। संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए।

रानी जुबैदा ने बुढ़िया को गले लगा लिया

और अपने संदूकचे से एक हीरे की अँगूठी उसे इनाम दी और कहा, अम्मा, तुमने मुझ पर बड़ा अहसान किया है। अब मेरे जी को चैन आया। अब तुम तुरंत कारीगर के पास जाओ और जितनी जल्दी हो सके उससे पुतला बनवाओ। यहाँ का प्रबंध मैं करती हूँ। बुढ़िया दूसरे ही दिन कारीगर से उचित नाप का एक पुतला बनवा लाई। इधर फितना की दासी ने फितना के मरने का शोर मचा दिया और जुबैदा ने मसरूर को आदेश दे कर वह ताबूत गड़वा दिया जिसमें काठ का पुतला रखा हुआ था। उसने स्वयं भी काले कपड़े पहन कर मातम शुरू कर दिया। दूसरे दिन सैकड़ों मजदूर लगवा कर कब्र पर बड़ा मकबरा खड़ा कर दिया और उसमें फितना का चित्र लगवा दिया। वह स्वयं भी दासियों समेत काले कपड़े पहन कर फितना के मकबरे पर मातम करने गई। इतने आयोजन के फलस्वरूप समस्त नगर निवासियों को मालूम हो गया कि फितना मर गई है।

गनीम को शहर में यह समाचार मिला

तो उसने आ कर फितना से कहा, सुंदरी, तुम्हारी मृत्यु का समाचार सारे शहर में फैल गया है। फितना ने कहा, मैं भगवान की आभारी हूँ कि उसने तुम्हारे हाथों मेरी प्राण रक्षा करवाई। भगवान की कृपा रही तो वे सब लोग जो इस समय मेरे विरुद्ध षड्यंत्र कर रही हैं शर्मिंदा होंगे। भगवान चाहेगा तो एक दिन हम दोनों का मनोरथ पूरा होगा। तुमने निःस्वार्थ भाव से जो भलाई मेरे साथ की है खलीफा उसका पारितोषिक तुम्हें देगा और आश्चर्य नहीं तुम्हारे इनाम में मुझे ही दे डाले। गनीम बोला, प्रबुद्धजनों ने कहा है कि स्वामी की संपत्ति सेवक को लेनी क्या, उसे लेने की इच्छा भी नहीं करनी चाहिए।

खलीफा को युद्धभूमि में काफी समय लगा। शत्रु को परास्त करके तीन महीने बाद जब वह बगदाद वापस आया तो उसने सोचा कि पहली फुरसत ही में फितना के पास जाऊँ।

किंतु अपने महल में आते ही जुबैदा और दासियाँ शोकवसन पहने दिखाई दीं

तो उसने पूछा कि इसका क्या कारण है। जुबैदा ने छल के आँसू बहाते हुए फितना की मृत्यु का समाचार दिया। खलीफा इसे सुन कर मूर्छित होने लगा तो मंत्री जाफर ने उसे सँभाला। खलीफा की तबीयत कुछ सँभली तो उसने पूछा कि फितना को कहाँ दफन किया गया है। जुबैदा ने कहा कि मैंने शाही कब्रिस्तान में उसके लिए अच्छी कब्र बनवाई है और उस पर एक शानदार मकबरा बनवाया, जिसमें फितना का चित्र भी रखा है, आप कहें तो आपके साथ चल कर सब कुछ दिखाऊँ। खलीफा ने कहा, तुम आराम करो, मैं स्वयं ही वह मकबरा देख आऊँगा।

खलीफा मसरूर को ले कर गया

तो देखा कि बड़ी सुंदर कब्र और मकबरा मौजूद है और वहाँ बहुत-से दीये जल रहे हैं। उसे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि सौतिया डाह होने पर भी जुबैदा ने फितना के अंतिम संस्कार के लिए ऐसा आयोजन किया है। उसने सोचा कि यह संभव है कि जुबैदा ने फितना को निकाल दिया हो और इस बात को छुपाने के लिए उसकी मौत का ढोंग रचाया हो। उसने मकबरे पर लगा हुआ चित्र भी उतार कर देखा तो वह काफी खराब था, किसी अनाड़ी चित्रकार से जल्दी में बनवाया हुआ लगता था। अब उसने सोचा कि कब्र खुदवा कर देखना चाहिए कि फितना वास्तव में मरी है या जीवित है। उसने धर्मगुरुओं से सलाह ली तो उसने कहा कि आप यह काम नहीं कर सकते क्योंकि इस्लाम में कब्र खुदवाना धर्मविरुद्ध है।

इस पर खलीफा ने फितना की कब्र खुदवाने का विचार त्याग दिया

और रस्मी तौर पर उसके लिए मातम शुरू कर दिया। उसने कई कुरानपाठियों को फितना की कब्र पर निरंतर कुरान पाठ करने के लिए नियुक्त किया। स्वयं काले कपड़े पहन लिए और शोक और विषाद का जीवन व्यतीत करने लगा। एक महीने तक रोजाना एक बार जाफर और अन्य सभासदों को ले कर फितना की कब्र पर जाता और फातिहा पढ़ता और बैठ कर उसकी याद में आँसू बहाता। इस सारी अवधि में उसने राज्य-प्रबंध भी नहीं देखा और सारे समय रुदन और विरह-विलाप करता रहा।

चालीस दिनों के बाद मातम खत्म हुआ।

खलीफा ने खुद काले कपड़े उतारे और दूसरों से भी मातमी लिबास उतारने को कहा। इस सारे समय में वह कभी ठीक से सोया नहीं था इसलिए बहुत थका हुआ था। वह अपने शयनकक्ष में गया और पलंग पर जा कर सो रहा। थकन और जगाई के बावजूद उसको गहरी नींद नहीं आई।

शयनकक्ष में दो दासियाँ मौजूद थीं ताकि खलीफा उठ कर जो आज्ञा दे उसका पालन करें। एक उसके सिरहाने की ओर बैठी थी, उसका नाम नूरुन्निहार था। दूसरी पैंताने की तरफ बैठी थी, उसका नाम निकहत था। दोनों समय काटने के लिए कशीदाकारी कर रही थीं। पहली ने खलीफा को सोता जान कर कहा, मुझे एक शुभ संवाद मिला है जिससे खलीफा खुश होंगे। फितना मरी नहीं है। निकहत ने आश्चर्य से उच्च स्वर में कहा, हैं, फितना जिंदा है? उसकी ऊँची आवाज से खलीफा जाग गया और डाँट कर बोला, बदतमीजो, तुमने शोर करके मुझे क्यों जगाया?

दासी ने काँपते हुए उत्तर दिया, हुजूर, मेरा अपराध क्षमा करें,

मैंने आपके आराम में विघ्न डाला किंतु इस दूसरी दासी ने बात ही ऐसी कही थी जिससे मेरी आवाज ऊँची हो गई। इसने कहा है कि आपकी प्रेयसी फितना मरी नहीं है, जीवित हैं। खलीफा ने नूरुन्निहार से पूछा तो उसने हाथ जोड़ कर कहा, सरकार, मुझे आज शाम ही को फितना का लिखा हुआ एक पत्र मिला है। मैं चाहती थी कि आपके शयनकक्ष में आते ही वह पत्र आपको दिखाऊँ क्योंकि उसमें फितना ने सारा हाल लिखा है। किंतु आप बहुत थके हुए थे इसलिए मैंने सोचा आप के जागने पर सारा हाल आप को बताऊँ।

खलीफा ने कहा, तू बड़ी बेवकूफ है।

इतना महत्वपूर्ण पत्र छुपाए रही। अभी निकाल कर वह पत्र मुझे दे। और हाँ, तुझे वह पत्र मिला कहाँ? नूरुन्निहार ने बताया, मैं महल के बाहर एक काम से गई थी। तभी एक आदमी मेरे हाथ में यह पत्र दे कर चला गया। मैं उससे कुछ पूछ तो क्या पाती, उसकी सूरत भी ठीक तरह से नहीं देख सकी। यह कह कर उसने वह पत्र दे दिया। खलीफा ने देखा कि पत्र फितना ही की हस्तलिपि में है। उसमें उसने अपने जीते जी गाड़े जाने और फिर गनीम द्वारा बचाए जाने का विवरण लिखा था और यह भी लिखा था कि गनीम बड़े सद्भाव से मेरी सेवा करता है।

खलीफा को पत्र पढ़ कर न फितना के जीवित होने की प्रसन्नता हुई न जुबैदा की हरकत पर क्रोध आया। उसे क्रोध आया तो गनीम पर जिसने उसकी प्रेयसी को घर में डाल रखा था। उसे विश्वास हो गया कि गनीम ने फितना के साथ संभोग अवश्य किया होगा और खलीफा की प्रतिष्ठा का ध्यान नहीं रखा होगा। वह फितना पर दाँत पीसता रहा कि उस नौजवान के साथ गुलछर्रे उड़ाती रही और यह भी ध्यान न दिया कि मैं खुद उसके वियोग में किस तरह चालीस दिन तक तड़पता रहा।

रात में तो उसने किसी से कुछ नहीं कहा

लेकिन दूसरे दिन दरबार में जा कर उसने प्रधानमंत्री जाफर को बुला कर कहा, आज मैं तुम्हारी मुस्तैदी की परीक्षा लेता हूँ। तुम चार हजार सिपाहियों को ले कर अमुक मुहल्ले में जाओ। वहाँ दमिश्क का एक जवान व्यापारी गनीम रहता है। उसके पिता का नाम अय्यूब है। उसने मेरी प्रेयसी फितना को रख छोड़ा है। तुम जा कर गनीम को पकड़ो और उसके हाथ-पैर बाँध कर ले आओ। और ध्यान रहे कि फितना भी हाथ से निकलने न पाए, उसे भी पकड़ कर ले आना किंतु उसे बाँधना नहीं। इसके साथ ही जिस मकान में गनीम रहता है उसे खुदवा कर जमीन के बराबर करवा देना। मैं उन दोनों को कठोर दंड देना चाहता हूँ।

मंत्री जाफर ने यह आज्ञा पा कर चार हजार सैनिक बुलाए

और कुछ ही देर बाद गनीम के भव्य भवन को चारों ओर से घेर लिया। वह अपने साथ सैकड़ों बेलदार भी ले गया था ताकि मकान को खुदवा कर जमीन के बराबर करवा दे। सिपाहियों को भी उसने ताकीद की कि बहुत होशियार रहो ताकि गनीम कहीं से निकल कर भागने न पाए। गनीम पकड़ा जाता किंतु फितना राज कर्मचारियों के तौर-तरीकों से परिचित थी। उसने दूर ही से मंत्री को सेना के साथ आते देख कर समझ लिया कि खलीफा को यहाँ का हाल मालूम हो गया है और उसने दोनों को पकड़वाने के लिए सेना भेजी है।

उसी समय गनीम और फितना भोजन से निवृत्त हुए थे।

फितना को बड़ा भय अपने से अधिक गनीम के लिए हुआ क्योंकि वह उसे प्रेम करने लगी थी। उसने यह भी सोचा कि खलीफा को मुझसे प्रेम है इसलिए मुझे तो मामूली सजा ही देगा। किंतु इस निरपराध को जरूर मरवा डालेगा। उसके मुँह से गिरफ्तारी के लिए सैनिकों के आने का हाल सुन कर गनीम प्राण-भय से काँपने लगा और उसमें बोलने और उठने की शक्ति भी नहीं रही। फितना ने झुँझला कर उसे हाथ पकड़ कर उठाया और बोली, मूर्ख, देर करने का समय नहीं है। तुम फौरन गुलामों जैसे कपड़े पहनो, मुँह और हाथ-पैर में कोयले का चूरा मलो जिससे हब्शी मालूम पड़ो। इसके बाद रसोई के बरतनों का टोकरा ले कर बाहर निकल जाओ। वे लोग तुम्हें गुलाम समझ कर जाने देंगे। इसके अलावा और किसी तरह तुम्हारी जान नहीं बच सकेगी। अगर वे लोग पूछें कि तुम्हारा मालिक कहाँ है तो कहना कि घर के अंदर है।

गनीम ने कहा, इस समय मुझे अपने प्राणों से भी अधिक तुम्हारी सुरक्षा की चिंता है।

फितना बोली, मेरी चिंता न करो। मैं खलीफा के सामने अपना सारा अपराध क्षमा करवा लूँगी। किंतु तुम्हें देखते ही वह तुम्हें मरवा डालेगा और किसी की कुछ न सुनेगा। मैं घर का सामान भी बचा लूँगी और यह भी संभव है कि बाद में समझा-बुझा कर खलीफा से तुम्हें माफी दिलवा दूँ। अब तुम देर न करो, जैसा मैंने कहा है उसी उपाय से बच कर निकल जाओ। गनीम फिर भी हिचक रहा था लेकिन फितना ने उसे जबर्दस्ती गुलामों के कपड़े पहना दिए। गनीम ने अपने हाथ-पैर और मुँह पर राख और कोयले का चूरा मल कर एक टोकरे में रसोई के खाली बरतन ले कर निकला। सिपाहियों ने समझा कि घर का यह गुलाम बरतनों पर कलई करने जा रहा है। इसलिए उन्होंने उससे रोक-टोक नहीं की। वह बड़े इत्मीनान से मंत्री जाफर के सामने से निकल गया और जाफर को भी कुछ संदेह न हुआ। जाफर के साथ जो बड़े-बड़े जासूसों के अफसर थे वे भी गनीम के छद्य वेश के धोखे में आ गए और गनीम के प्राण फितना की बताई तरकीब से बच गए।

इधर मंत्री ने घर का दरवाजा खुलवाया और अफसरों के साथ घर में आ गया।

उसने देखा कि घर के अंदरूनी कमरों में बहुत-सा कीमती सामान, व्यापार की कुछ वस्तुएँ और रुपए-पैसे से भरे संदूक हैं। वह सारा माल गनीम का था। फितना मंत्री को देख कर काँपती हुई उठी जैसे कि उसे मृत्युदंड सुनाया जा रहा है। फिर वह मंत्री के पैरों के सामने गिर पड़ी और बोली, खलीफा ने अगर मेरे बारे में कोई आदेश दिया हो तो कृपया मुझसे कहें, मैं उसका तत्काल पालन करूँगी। मंत्री ने सविनय प्रणाम किया और कहा, सुंदरी, मुझे खलीफा ने यह आदेश दे कर भेजा है कि मैं तुम्हें उन तक पहुँचाऊँ और यह भी कहा है कि इस मकान के मालिक गनीम नामक व्यापारी को पकड़ कर उनके सामने ले चलूँ। उन्होंने यह भी आदेश दिया है कि इस घर को खुदवा कर जमीन के बराबर करवा दूँ।

फितना ने कहा, मैं तो मौजूद ही हूँ। मुझे खलीफा के सामने पहुँचा दो। जहाँ तक गनीम का सवाल है, वह एक महीना से अधिक हुए व्यापार के लिए बाहर चला गया है, शायद दमिश्क गया हो। जाते समय वह अपना रुपया-पैसा और मूल्यवान वस्तुएँ मेरे सुपुर्द कर गया कि मैं इनकी रखवाली करूँ। आप इस माल-असबाब को भी खलीफा के ताशखाने में पहुँचा दीजिए और फिर घर का जो चाहे कीजिए।

मंत्री जाफर ने यही किया।

उसने पहले मकान की तलाशी ली किंतु गनीम कहीं नहीं मिला। फिर उसने मजदूरों के सिरों पर रखवा कर गनीम की सारी संपत्ति राजमहल में पहुँचा दी। फितना को ले कर खुद खलीफा के पास चल दिया और कोतवाल को आदेश दिया कि मकान को होशियारी से खुदवाओ ताकि गनीम अगर कहीं छुपा हुआ हो तो मलबे में दब न जाए बल्कि निकल भागने का प्रयत्न करे। उस समय तुम उसे पकड़ कर खलीफा के दरबार में पहुँचा देना क्योंकि खलीफा उसकी गिरफ्तारी पर बड़ा जोर दे रहे हैं।

मंत्री और अन्य अफसर इधर राजमहल को चले

उधर कोतवाल ने मकान के चप्पे-चप्पे की तलाशी ली किंतु गनीम को कहीं नहीं पाया। खलीफा ने वजीर को आते देखा तो दूर ही से पूछा, मेरी आज्ञाओं का पालन किया? जाफर ने कहा, एक को छोड़ कर सभी आज्ञाओं का पालन हुआ है। अभी आ कर पूरा हाल बताता हूँ। इतने में कोतवाल भी आ गया किंतु गनीम का कहीं पता नहीं चला। मंत्री ने खलीफा के पास जा कर फितना और उसकी दोनों दासियों को उपस्थित किया और कहा, मैंने मकान का एक-एक कोना छान मारा लेकिन गनीम कहीं नहीं था। लोगों ने बताया कि वह एक महीने से अधिक हुआ व्यापार के काम से दमिश्क चला गया है। इसके बाद मैंने बेलदार लगवा कर अपने सामने उसका मकान गिरवा कर जमीन के बराबर कर दिया।

खलीफा को गनीम के हाथ से निकल जाने पर और गुस्सा आया।

उसने अपने सामने खड़ी भय से काँपती फितना को देखा तो गुस्से के कारण उससे भी कुछ न बोला क्योंकि वह समझता था कि यह गनीम के उपभोग में रही है। उसने महल के हब्शी प्रबंधक मसरूर से कहा कि इसे दासियों के लिए बने बंदीगृह में डाल दे। यह बंदीगृह खलीफा के अपने निवास कक्षों से लगा हुआ था।

फिर खलीफा ने उसी क्रोध की दशा में पत्र लेखक को बुलवाया और दमिश्क के हाकिम के नाम निम्नलिखित पत्र लिखवाया :

दमिश्क के हाकिम को खलीफा हारूँ रशीद की ओर से ज्ञात हो

कि दमिश्क के मृत व्यापारी अय्यूब का पुत्र गनीम शाही महल की एक दासी का अपहरण करके ले गया था। इस समय वह भागा हुआ है। आप उसे हर जगह ढुँढ़वाएँ। जहाँ मिले उसे पकड़ कर हथकड़ी डाल कर गलियों में फिराएँ और सिपाहियों को आदेश दें कि हर चौराहे पर उसे कोड़े मारें और घोषणा करें कि बादशाह या खलीफा के साथ धोखा करनेवाले और उसकी दासी को भगानेवाले का यही दंड होता है। फिर उसे पहरे में मेरे पास भेज दें ताकि मैं उसका उचित न्याय करूँ। उसके घर को खुदवा दें और उस जमीन पर हल चलवा दें।

अगर वह न मिले तो दमिश्क में उसकी माँ, बहन,

भाई या जो भी दूसरे कुटुंबी हों उन्हें भी इसी प्रकार का दंड तीन दिन तक दिया जाए। अगर दमिश्क का कोई ओर निवासी गनीम की किसी प्रकार की प्रत्यक्ष या परोक्ष सहायता करता हुआ पाया जाए तो उसे भी इसी प्रकार नगर में अपमान तथा मकान खुदवा डालने का दंड दिया जाए। इस आदेश को जरूरी समझें और इसका अविलंब और पूर्णरूपेण पालन करें।

खलीफा ने यह पत्र बंद करवाया और लिफाफे पर अपनी मुहर लगवाई।

फिर एक दूत को आज्ञा दी, इसे दमिश्क के हाकिम के पास ले जा कर दो। अपने साथ एक सिखाया हुआ कबूतर भी ले जाओ। इस पत्र की रसीद दमिश्क के हाकिम जुबैनी से ले कर कबूतर के पंख में बाँध कर इधर उड़ा देना ताकि उसी दिन कुछ घंटों के अंदर मुझे मिल जाए। दूत ने खलीफा का पत्र जुबैनी को दिया तो उसने वह रस्म के अनुसार पहले अपने सिर पर रखा और तीन बार चूम कर खोला और पढ़ा। फिर दूत को उसकी रसीद दे दी।

इसके बाद जुबैनी कोतवाल और सिपाहियों को ले कर गनीम के घर पर पहुँचा।

गनीम जब से दमिश्क छोड़ कर बगदाद गया था तब से उसने कोई पत्र भी अपनी माँ को नहीं भेजा था। जो व्यापारी उसके साथ गए थे उन्होंने भी बताया कि गनीम उनसे अलग रहने लगा था। बहुत दिनों तक उसका पता न चलने से माँ ने सोचा कि वह मर गया है। वह खूब रोई जैसे उसके सामने ही उसका बेटा मरा हो। उसने अपने घर में प्रतीक रूप में उसकी कब्र बनवाई और उस पर उसका चित्र रखा और रोज कुछ देर के लिए कब्र पर बैठ कर मातम करती जैसे कि वास्तव में गनीम की लाश कब्र के अंदर हो। उसकी बेटी अलकिंत भी अपनी माँ के साथ मिल कर अपने भाई का मातम किया करती थी। उनके पड़ोसी भी अक्सर मातम में शरीक हो जाया करते थे। अच्छे पड़ोसी इसी तरह मातम में शरीक हुआ करते थे।

जुबैनी ने दरवाजे पर जा कर आवाज दी तो अंदर से एक दासी निकली।

जुबैनी ने स्वयं उससे पूछा कि गनीम कहाँ है। दासी दमिश्क के हाकिम को पहचान गई और घबराहट में हकला कर बोली, सरकार, गनीम का तो काफी दिन पहले देहावसान हो गया है। उसकी माँ और बहन रोज उसकी कब्र पर बैठ कर मातम किया करती हैं। इस समय भी वहाँ बैठी मातम कर रही हैं। जुबैनी ने दासी की बात पर विश्वास नहीं किया और खुद ही कोतवाल समेत घर के अंदर घुस आया और सिपाहियों से कहा, घर का कोना-कोना छानो और गनीम कहीं छुपा हो तो उसे बाहर निकालो।

गनीम की माँ और बहन ने बाहरी आदमियों को देख कर अपने चेहरे ढक लिए। फिर गनीम की माँ ने जुबैनी के पैरों के पास जमीन से सिर लगा कर पूछा कि कैसे कष्ट किया। उसने कहा, देवी जी, हम तुम्हारे पुत्र गनीम की तलाश में आए हैं। वह यहाँ है या नहीं?

वह बोली, वह तो बहुत दिन हुए मर गया

और अब हम माँ-बेटियाँ उसकी कब्र पर मातम ही किया करते हैं। यह कह कर वह अपने बेटे की याद करके फूट-फूट कर रोने लगी और आगे कुछ न कह सकी। जुबैनी मन में सोचने लगा कि अपराधी तो गनीम है, उसकी माँ और बहन का क्या अपराध है। यह हारूँ रशीद का बड़ा अन्याय है जो इन्हें दंड दे रहा है। किंतु खलीफा का आदेश स्पष्ट था और जुबैनी को उसका पालन करना ही था।

कुछ देर में वे लोग जिन्हें जुबैनी ने नगर में गनीम की खोज करने के लिए भेजा था

वापस आ गए और जुबैनी को बताया कि गनीम का पता कहीं नहीं चला। गनीम की माँ और बहन के मातम करने से जुबैनी को यह भी विश्वास हो गा कि गनीम की मृत्यु हो गई है। जुबैनी को इन निर्दोष स्त्रियों को दंड देने में बड़ा कष्ट हो रहा था किंतु वह खलीफा के आदेश के कारण विवश था। उसने गनीम की माँ से कहा, माताजी, आप बेटी को ले कर घर से निकल जाइए। वे बेचारियाँ घर से निकल कर गली में बैठ गईं। जुबैनी ने इस खयाल से कि उनकी बेपरदगी न हो उन्हें अपनी लंबी-चौड़ी चादर उढ़ा दी। फिर उसने नगर निवासियों को आदेश दिया कि घर में घुस कर सब कुछ लूट लो।

यह सुनते ही सैकड़ों मनुष्य घर में घुस गए और उन्होंने कुछ ही मिनटों में घर का सफाया कर दिया। गहने, कपड़े, बरतन, काठ, कबाड़ सब लूट कर ले गए। गनीम की माँ और बहन दुख और आश्चर्य से इस लूटपाट को देखती रहीं। फिर जुबैनी ने कोतवाल को आज्ञा दी कि घर को गिरवा कर जमीन के बराबर करवा दो। कोतवाल ने सैकड़ों मजदूर लगवा दिए और कुछ मिनटों के बाद घर का नाम-निशान तक बाकी न रहा। दोनों स्त्रियाँ यह देख कर सिर पीट कर रोने लगीं।

लेकिन उन्हें तो और भारी मुसीबतें देखनी थीं।

उस दिन जुबैनी उन्हें अपने महल में ले गया और बोला, मैं जानता हूँ कि आप लोगों का कोई कसूर नहीं है लेकिन खलीफा ने मुझे आदेश दिया है कि मैं आप लोगों को दंड दूँ और मुझे वह आदेश मानना ही है। दूसरे दिन वह उन्हें महल से बाहर मैदान में लाया और आज्ञा दी कि इनके कपड़े उतार दो और पुरवासी इनके नंगे शरीरों पर कोड़े चलाएँ। जब उनके ऊपरी वस्त्र उतारे गए तो उनके कोमल गुलाबी शरीरों को देख कर जुबैनी को दया आई। उसने घोड़े के बालों से बुने हुए दो भारी कंबल उन्हें उढ़ा दिए ताकि उन्हें कम चोट लगे। उसने उनके सिर भी ढक दिए और उनके बालों को शरीर के चारों ओर बिखरा दिया।

अलकिंत के बाल बड़े नर्म थे और इतने लंबे थे कि एड़ियों तक पहुँचते थे। ऐसी अपमानजनक स्थिति में उन्हें नगर में घुमाया गया। उनके साथ कोतवाल भी था जो सिपाहियों को साथ लिए हुए था। एक मुनादी करनेवाला उनके आगे-आगे यह मुनादी करता जाता था कि खलीफा के प्रति अपराध करनेवालों के कुटुंबियों की यही दशा होती है। इन दोनों माँ-बेटियों ने ऐसा अपमान कहाँ देखा था। बेचारियाँ फूट-फूट कर रो रही थीं लेकिन उन पर दया करनेवाला कोई नहीं था। उन्होंने अपने बालों को अपने चेहरों पर डाल लिया ताकि उन्हें जनसाधारण न देख सके।

उनकी दुर्दशा पर साधारणतः नगर निवासी भी दुखी थे।

स्त्रियाँ अपनी छतों पर चढ़ कर या अपनी खिड़कियों से इस दृश्य को देखतीं और हाय-हाय करती थीं। बच्चे अपनी माँ-बहनों का रोना-पीटना सुन कर सहम जाते थे। विशेषतः लोगों को अलकिंत की इस दशा पर बहुत दुख था क्योंकि वह नवयुवती और अतीव सुंदरी थी। दिन भर उन्हें नगर में इसी अपमान के साथ घुमाया गया और कोड़े मारे गए। शाम को फिर उन्हें जुबैनी के महल में लाया गया। उस समय थकन, चोटों और अपमान के दुख से दोनों बेहोश हो गईं।

दमिश्क के हाकिम जुबैनी की पत्नी को उनकी इस दशा पर तरस आया।

जुबैनी ने खलीफा के आदेश के अनुसार आज्ञा दी थी कि गनीम की माँ और बहन की कोई व्यक्ति सहायता न करे। किंतु जुबैनी की पत्नी ने गुप्त रुप से उनकी सहायता के लिए अपनी दासियाँ भेजीं। इन दासियों ने उन बेहोश पड़ी औरतों के मुँह पर गुलाबजल के छींटे दिए और उनके आँखें खोलने पर उन्हें शरबत पिलाया। इसके बाद वे दोनों उठ कर बैठ गईं।

दासियों ने उन्हें पंखा झला और बताया

कि तुम लोगों की यह दशा देख कर जुबैनी की बेगम को बहुत दुख हुआ है और उन्होंने हम लोगों को इसलिए यहाँ भेजा है कि तुम लोगों की यथासंभव सहायता करें यद्यपि खलीफा के आदेश के अनुसार तुम्हारी सहायता करनेवाला भी दंड का भागी होगा। गनीम की माँ जुबैनी की पत्नी के प्रति देर तक आभार प्रकट करती रही और उसे दुआएँ देती रही। फिर उसने पूछा कि हाकिम जुबैनी ने हम लोगों को इतना दंड तो दिया लेकिन यह नहीं बताया कि मेरे बेटे ने खलीफा के प्रति ऐसा कौन-सा अपराध किया था जिसका यह दंड हमें मिला है। दासियों ने कहा, हम ने तो यह सुना है कि तुम्हारा पुत्र गनीम खलीफा की एक अतिसुंदर प्रेयसी को ले भागा है, उसी कारण खलीफा ने तुम लोगों को यह दंड देने का आदेश दिया है। अब तुम यह तो जानती ही हो कि खलीफा के आदेश का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। इसलिए हमारे मालिक जुबैनी ने विवश हो कर तुम्हें यह दंड दिया है। वैसे हमारे मालिक को तुम्हारे निर्दोष होने के कारण तुम्हें दंड देने का बहुत बड़ा दुख है। और हमारी मालकिन तथा हम लोगों को भी तुम्हारे लिए बड़ा खेद है, लेकिन इस मामूली मदद के अलावा हम लोग तुम्हारी और कुछ सहायता नहीं कर सकते।

गनीम की माँ ने कहा, यह तो मैं कभी नहीं मान सकती

कि मेरे बेटे ने वह अपराध किया होगा जिसका दोष उस पर लगाया गया है। मैंने उसे बचपन ही से उसकी शिक्षा और आचार-व्यवहार के प्रशिक्षण पर बहुत परिश्रम किया है। विशेष रूप से हम लोगों ने उसे इस बात की पूरी शिक्षा दी है कि बादशाहों और अमीर-उमरा के साथ किस प्रकार का बरताव करना चाहिए। अपहरण जैसा लफंगों का काम उससे हो ही नहीं सकता। फिर भी यह सुन कर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई कि वह भागा हुआ है क्योंकि इसका अर्थ यह है कि वह जीवित है। हम तो उसे मरा ही समझ बैठे थे। अगर वह जीता है तो हमें अपनी दुर्दशा और अपमान का कोई दुख नहीं। हम उसके लिए बड़ा से बड़ा कष्ट उठा सकते हैं। हाकिम जुबैनी ने जो कुछ किया हमें उसकी कोई शिकायत नहीं है।

अलकिंत को भी अच्छी तरह होश आ गया था।

वह अपनी माँ की बातें सुन कर उसके गले से लिपट गई और बोली, अम्मा, तुमने बिल्कुल ठीक कहा। अगर भाई जिंदा है तो मैं उसके पीछे और भी कष्ट भोगने के लिए तैयार हूँ। इसके बाद दोनों माँ बेटी फूट-फूट कर रोने लगीं। जुबैनी के महल की दासियों को भी दुख हुआ और वे भी रोने लगीं। फिर इन दासियों ने उन्हें भोजन करने को कहा। उनकी इच्छा तो नहीं थी किंतु दासियों के बहुत कहने-सुनने से उन्होंने थोड़ा-बहुत भोजन पेट में डाल लिया।

खलीफा का आदेश था

कि उन लोगों को तीन दिन तक सार्वजनिक अप्रतिष्ठा का दंड दिया जाए। अतएव जुबैनी ने दूसरे दिन भी उन्हें उसी प्रकार नगर में अपमानपूर्वक फिराने का आदेश दिया। किंतु अब नगर निवासी इस बेकार बात से बहुत ऊब चुके थे। वे अपना काम-धंधा बंद कर के शहर के बाहर चले गए। उनकी स्त्रियों ने भी घरों के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर लीं। इस प्रकार सार्वजनिक अपमान का उद्देश्य ही पूरा नहीं हुआ। जुबैनी के इशारे पर उन लोगों पर सिपाहियों की मार भी दिखाने भर की पड़ी।

उसके अगले दिन भी दंड की यह रस्म पूरी की गई,

उस दिन भी नगर में सन्नाटा रहा। इसके अगले दिन जुबैनी ने आज्ञा दे कर घोषणा करवाई कि कोई नगर निवासी इन दोनों स्त्रियों को अपने यहाँ शरण न दे वरना खलीफा के द्वारा निर्धारित दंड का भागी होगा। साथ ही आज्ञा दी कि इन दोनों को नगर की सीमा से बाहर कर दिया जाए ताकि यह जहाँ चाहें चली जाएँ। पहले वे दोनों नगर निवासियों के पास ही गईं कि कुछ सहायता लें किंतु सभी को डर था कि खलीफा के आदेश से जुबैनी उन्हें दंड देगा इसलिए जिसके पास जाती वह या तो उन्हें दुतकार कर भगा देता या खुद भाग जाता।

दो-चार जगह यह व्यवहार देख कर गनीम की माँ ने बेटी से कहा,

इस शहर में हमें कोई भी व्यक्ति आश्रय नहीं देगा, सभी को अपनी जान की पड़ी है। यहाँ तो शरण क्या, कोई हमें भीख भी नहीं देगा जिससे हम पेट भर सकें। अब इस के अलावा और कोई उपाय नहीं है कि हम किसी अन्य देश में जाएँ। इधर जुबैनी ने कबूतर द्वारा खलीफा के पास संदेश भिजवाया कि आपके आदेश का पालन कर दिया गया। खलीफा ने उसी कबूतर से यह आदेश भिजवाया कि तीन मंजिल (एकदिवसीय यात्रा की दूरी) इधर-उधर तक के गाँवों में मुनादी करा दो कि इन लोगों की कोई आदमी सहायता न करे ताकि इन लोगों को फिर से अपने शहर में आने की कोई संभावना ही न रहे।

जुबैनी ने खलीफा के आदेशानुसार यह मुनादी तो करवा दी

किंतु इन दोनों से कह भी दिया कि नए आदेश के अनुसार तुम्हें कोई शरण तीन मंजिलों तक नहीं मिल सकेगी। साथ ही उन दोनों को आधी-आधी अशर्फी भी चुपके से दे दी कि चार-छह दिन तक खाने का प्रबंध कर लें। वे दोनों जुबैनी के दिए कंबल ओढ़ कर ओर गले में पुराने कपड़ों की बनी भीख की झोली डाल कर शहर से निकलीं। रात के समय वे किसी मसजिद में जा कर पड़ी रहतीं और मसजिद न होती तो किसी टूटी-फूटी सराय के कोनों में ठहर जातीं। काफी दूर जाने पर वे एक गाँव में पहुँची। वहाँ किसानों की स्त्रियाँ उनके चारों ओर एकत्र हो गईं और पूछने लगीं कि कौन हो। उन्होंने बताया कि हम लोग खलीफा के आदेशानुसार प्रताड़ित किए गए हैं। स्त्रियों ने पूछा कि खलीफा ने तुम्हें यह दंड क्यों दिया तो उन्होंने पूरा हाल बताया।

किसानों की स्त्रियों को उनकी इस दशा पर बड़ी दया आई।

उन्होंने उनके कंबलों को उतरवा कर उन्हें पहनने के लिए अपने कपड़े दिए और उन्हें भोजन कराया। किंतु वे गाँव में क्या करतीं, उन्हें गनीम को भी खोजना था। इसलिए एक दिन आराम करके दूसरे दिन वे वहाँ से चलीं और पूर्ववत माँगते-खाते हुछ दिनों बाद हलब नगर में पहुँचीं। वहाँ दो-चार दिन घूम कर गनीम का पता लगाने की कोशिश की। फिर वहाँ से रवाना हुईं ओर कई दिन के बाद मोसिल नगर पहुँचीं। वहाँ भी कई दिन तक पूछने पर गनीम का पता न चला तो वे दोनों बगदाद की ओर चलीं कि शायद वह उसी नगर में कहीं छुप रहा हो। यद्यपि इन भिखमंगी बनी हुई स्त्रियों को किसी छुपे हुए अपराधी का पता मिलना असंभव था तथापि आशा बलवती होती है। और वही आशा इन्हें द्वार-द्वार भटका रही थी। बेचारियाँ हर एक से गनीम के बारे में पूछतीं और हर जगह से जवाब मिलता कि हमें कुछ नहीं मालूम।

उधर फितना पर क्या बीती यह भी सुनिए।

वह बेचारी अपने कारागार की तंग कोठरी में रात-दिन विलाप किया करती। उसी कोठरी से लगा हुआ खलीफा के आवास का आँगन था। वह अक्सर शाम को उस आँगन में टहलता और उसी समय अपनी प्रशासनिक समस्याओं पर विचार किया करता था। एक शाम को वह वहाँ टहल रहा था कि उसे अत्यंत करुण ध्वनि सुनाई दी। वह उसे सुन कर खड़ा हो गया। उसने ध्यान से सुना तो अपनी प्रेयसी फितना की आवाज पहचानी। वह कान लगा कर सुनने लगा। फितना रो-रो कर कह रही थी, अभागे गनीम, तू कहाँ है? तूने मेरी इतनी सेवा की और मेरी भलाई की और उसका बदला यह मिला कि आर्थिक रूप से बिल्कुल बरबाद हो गया। मालूम नहीं तू अब जिंदा है या खलीफा के डर से मर गया।

कुछ देर बाद उसकी आवाज फिर आई,

ओ खलीफा हारूँ रशीद, तूने निरपराध गनीम पर ऐसा अत्याचार किया जैसा किसी बादशाह ने किसी पर नहीं किया होगा। क्या तुझे ईश्वर का भय नहीं है? कयामत में जब सारे लोग ईश्वर के समक्ष होंगे और जब उनसे उनके भले-बुरे कामों की पूछताछ की जाएगी उस समय तू अपने इस महाअन्याय का क्या औचित्य देगा? यह कहने के बाद फितना जोरों से विलाप करने लगी। खलीफा यह सुन कर बड़ी चिंता में पड़ा। उसने सोचा कि अगर फितना सच कह रही है और गनीम निर्दोष है तो वास्तव में उस पर और उससे भी अधिक उसकी बहन पर अन्याय हुआ। खलीफा के लिए जो भगवान का प्रतिनिधि होता है ऐसा अन्याय किसी प्रकार उचित नहीं है।

वह अपने कक्ष में गया और वहाँ राजमहल के मुख्य अधिकारी मसरूर को बुलाया

और उसे आदेश दिया कि फितना को कैदखाने से निकाल कर मेरे पास ले आओ। मसरूर को फितना से स्नेह था। वह यह आदेश पा कर बड़ा प्रसन्न हुआ और फितना के पास जा कर बोला, सुंदरी, चलो, तुम्हें खलीफा ने बुलाया है। मुझे विश्वास है कि अब तुम कैद से छूट जाओगी। फितना तुरंत ही तैयार हो गई और मसरूर ने उसे खलीफा के सामने पेश कर दिया। खलीफा ने उसे देखते ही पूछा, तुमने यह कैसे कहा कि कयामत में मैं ईश्वर को मुँह नहीं दिखा सकूँगा। मैंने किस निरपराध व्यक्ति को हानि पहुँचाई है? तुम्हें मालूम है कि मैं न्याय के लिए प्रसिद्ध हूँ और किसी पर भी अन्याय नहीं करता न किसी और को अन्याय करने देता हूँ।

फितना समझ गई कि वह अभी जो विलाप कर रही थी

उसे खलीफा ने सुन लिया है। वह जमीन से सिर लगा कर बोली, मालिक, मेरे मुँह से कुछ अनुचित निकला हो तो मैं क्षमा चाहती हूँ। यह जरूर कहूँगी कि दमिश्क का व्यापारी गनीम रंचमात्र भी अपराधी नहीं है। उसने मेरे प्राण बचाए और मुझे अपने घर में आराम से रखा। पहले वह मुझे देख कर मेरी ओर आकृष्ट हुआ था किंतु जब उसे मालूम हुआ कि मैं आपकी सेवा में हूँ तो उसका रवैया बिल्कुल बदल गया। उसने मुझ से स्पष्ट कहा कि शासक की संपत्ति प्रजाजन के लिए त्याज्य है। उसके बाद वह मुझसे पवित्र प्रेम करता रहा है, अपना बिस्तर हमेशा दूसरे कमरे में लगवाता रहा है। यह सुन कर खलीफा ने फितना को जमीन से उठाया और कहा कि तुम अपना पूरा हाल बताओ कि मेरी अनुपस्थिति में तुम्हें क्या-क्या अनुभव हुए हैं।

फितना ने आद्योपरांत अपना वृत्तांत सुनाया।

खलीफा ने फितना से कहा, तुम्हारी बात के ढंग से लग रहा है कि तुम झूठ नहीं बोल रही हो। परंतु मेरी समझ में यह नहीं आया कि जब मैं इतने दिनों से आया हुआ हूँ तो तुम अब तक चुप क्यों रही और फिर अपना हाल भेजा भी तो लिख कर भेजा। इस देरी का क्या कारण है? फितना बोली, सरकार, इसका कारण यह है कि एक महीने से अधिक हुआ गनीम अपना तमाम माल-असबाब मेरे सुपुर्द करके बाहर चला गया। इस बीच मेरी किसी आदमी से बात ही नहीं हुई जो आप के आगमन का समाचार देता। बहुत दिनों में अपनी दासी द्वारा आप का समाचार ज्ञात हुआ तो फौरन ही मैंने पत्र भेजा।

खलीफा ने कहा, अब मुझे वास्तव में यह महसूस हो रहा है

कि मैंने गनीम और उसकी माँ और बहन के साथ घोर अन्याय किया है। मैं चाहता हूँ कि इस अन्याय का निराकरण करने के लिए उसका कुछ उपकार करूँ। तुम्हारे विचार से मुझे इस दशा में कार्य करने के लिए क्या करना चाहिए। फितना ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि खलीफा का क्रोध दूर हो गया है और वह दया दर्शाना चाहता है। उसने सिर झुका कर कहा, आप यह मुनादी करवा दीजिए कि गनीम का अपराध क्षमा किया गया। वह यह मुनादी सुनेगा तो वापस आ जाएगा। खलीफा ने कहा, ठीक है, मैं ऐसी ही घोषणा करवाए देता हूँ। उसका जो नुकसान हुआ है उससे दुगुना उसे दे दूँगा। और जब वह आएगा तो तुम्हारा विवाह भी उसके साथ कर दूँगा। खलीफा ने यह घोषणा तो करवा दी किंतु उसका कोई फल नहीं हुआ। न गनीम आया न किसी और ने उसका समाचार दिया। इस पर फितना ने खलीफा से कहा कि आप अनुमति दें तो मैं स्वयं गनीम को खोजने निकलूँ। खलीफा ने अनुमति दे दी।

फितना दूसरे दिन सवेरे ही एक तोड़ा अशर्फियों का ले कर निकली।

बड़ी मसजिद में जा कर उसने संतों और फकीरों को दान दिया और उनसे अपने मनोरथ की सिद्ध के लिए आशीर्वाद प्राप्त किए। फिर वह जौहरियों के बाजार में गई और एक दलाल से मिली। यह दलाल बहुत ही धर्मप्राण व्यक्ति था और विदेशियों तथा बीमारों को भरसक सहायता किया करता था। इसीलिए कई धनवान व्यक्ति उसके पास पुण्यार्जन के निमित्त धन भेजा करते थे और जिस दीन-दुखी को सहायता चाहिए होती थी वह उसके पास आया करता था।

फितना ने उसे अशर्फियों की थैली दे कर

कहा कि इस धन को भी दीन-दुखियों के काम में लगा देना। दलाल ने उसके राजसी वस्त्राभरण देखे तो समझ गया कि यह खलीफा की पत्नी या प्रेयसी है। उसने सिर झुका कर कहा, सुंदरी, मैं तुम्हारी आज्ञा से बाहर नहीं हूँ किंतु अच्छा होगा कि आप अपने हाथों ही से यह पुण्य कार्य करें। आप यदि मेरे घर चलने का कष्ट करें तो बहुत अच्छा रहेगा। मेरे यहाँ दो स्त्रियाँ आई हैं जो अत्यंत दीन दशा में हैं।

वे कल ही इस नगर में आई हैं

और यहाँ उनकी कोई जान-पहचान नहीं है। मैंने उन्हें इसलिए अपने घर में ठहराया है कि वे अत्यंत दयनीय दशा में थीं। उनके वस्त्र मैले-कुचैले और फटे-पुराने थे। धूप में चलने के कारण उनका रंग सँवला गया था और भूख-प्यास ने उनके शरीरों को अति दुर्बल कर दिया था और वे हड्डियों का ढाँचा भर रह गई थीं। मैंने उन्हें अपनी पत्नी के सुपुर्द कर दिया कि वह उनकी अच्छी तरह देखभाल करे। मेरी पत्नी ने उन्हें गरम पानी से नहलाया और सुखद शैय्या बिछवा कर उन्हें आराम करने को कहा और पहनने के लिए उचित वस्त्रादि दिए। उनकी ऐसी खराब हालत थी कि मैंने उनसे उनका हाल पूछना ठीक नहीं समझा। अब आप उचित समझें तो मेरे घर पधार कर उनका हाल पूछ लें।

दलाल ने अपने घर का पता बताया

तो फितना ने अपना शाही टट्टू तुरंत उस ओर दौड़ा दिया। दलाल भी उसके साथ दौड़ने लगा। फितना ने कहा, आप इस प्रकार न दौड़िए। आप जैसे सज्जन व्यक्ति के साथ मैं यह व्यवहार नहीं करना चाहती। आप अपना एक दास मेरे साथ कर दीजिए और स्वयं बाद में धीरे-धीरे आइए। दलाल ने अपना दास साथ कर दिया और फितना दलाल के घर जा कर सवारी से उतरी। दास ने अंदर जा कर सूचना दी कि एक बादशाही महल की महिला मिलने आई है। दलाल की पत्नी यह सुन कर जल्दी से उठी कि घर के दरवाजे पर जा कर राजमहिषी का स्वागत करे। फितना ने इसका अवसर न दिया। वह स्वयं दास के पीछे-पीछे चल कर जनानखाने में आ गई। दलाल की पत्नी उसके पाँव चूमने को झुकी। फितना ने यह भी न करने दिया। उसका सिर उठा कर वह बोली, महाभागे, मैं उन दो परदेशी स्त्रियों को देखने आई हूँ जो कल आपके घर पर आई हैं। दलाल की पत्नी उसे ले कर आगंतुकाओं की चारपाइयों के पास आ गई।

फितना ने उनके पास जा कर कहा, देवियो,

मैं आप लोगों का हाल-चाल पूछने और आपकी सेवा करने के लिए आई हूँ। वे स्त्रियाँ गनीम की माँ और बहन थीं। माँ ने फितना को आशीष दी, भगवान तुम्हें इस सत्कार्य का भरपूर फल दे। हम लोगों पर तो ऐसी आपदा पड़ी है जो कि भगवान शत्रु पर भी न डाले। यह कह कर वह रोने लगी। उसे रोते देख कर फितना और दलाल की पत्नी की आँखों में आँसू आ गए। फिर फितना ने कहा, माताजी, आप कृपया अपना वृत्तांत मुझे बताएँ, मैं भरसक आपकी सहायता करूँगी।

गनीम की माँ ने कहा, बेटी,

खलीफा की प्रेयसी फितना हमारे दुर्भाग्य का कारण बन गई है। फितना यह सुन कर भी चुप ही रही और ध्यानपूर्वक प्रौढ़ा की बात ऐसे सुनने लगी जैसे फितना को जानती ही न हो। गनीम की माँ ने कहा, मैं दमिश्क के प्रसिद्ध व्यापारी स्वर्गीय अय्यूब की पत्नी हूँ। मेरा पुत्र गनीम व्यापार के लिए बगदाद आया था। वहाँ उस पर फितना को भगाने का आरोप लगाया गया और खलीफा ने उसके वध की आज्ञा दी। लेकिन वह न मिला तो खलीफा ने दमिश्क के हाकिम को आदेश दिया कि गनीम की माँ और बहन को तीन दिन बीच शहर में कोड़े मारे जाएँ और घर का सामान लुटवा दिया जाए और घर गिरवा कर जमीन के बराबर करवा दिया जाए। हाकिम ने ऐसा ही किया और तीन दिन तक हम माँ-बेटी को पिटवा कर दमिश्क से निकाल दिया। इस सब पर भी हम दोनों को अपने भाग्य से कोई शिकायत नहीं रहेगी अगर मेरा प्यारा बेटा हमें देखने को मिल जाए। खलीफा की प्रेयसी के कारण हम पर और हमारे पुत्र पर जो कुछ अन्याय हुआ है वह हम खुशी से और हमेशा के लिए माफ कर देंगे और हमें उससे पूरी सहानुभूति और पूरा प्यार हो जाएगा अगर हमारा प्यारा गनीम हमें मिल जाए।

फितना बोली, माताजी, मैं ही वह अभागी फितना हूँ

जो तुम्हारे दुर्भाग्य का कारण बनी। किंतु मेरे दुर्भाग्य से आप लोगों की जितनी प्रतिष्ठा नष्ट हुई है भगवान चाहेगा तो उस से दुगुनी बनेगी और जो कुछ तुम्हारी धन हानि हुई है उसके बदले कई गुना धन तुम्हें मिलेगा। मेरी बात पर खलीफा ने विश्वास कर लिया है और मुनादी करवा दी है कि गनीम का अपराध क्षमा कर दिया गया और गनीम खलीफा के दरबार में हाजिर हो। माताजी, अब तुम धीरज रखो। खलीफा अब तुम लोगों से कुपित नहीं है। वह गनीम से मिलना चाहता है। वह चाहता है कि जो अन्याय उससे गनीम पर हुआ है उसका पूरा बदला उसे काफी इनाम-इकराम दे कर कर दे। उसने मुझ से यह भी कहा है कि गनीम आएगा तो मैं तेरा विवाह उसके साथ कर दूँगा। आज से तुम मुझे भी अपनी बेटी समझो।

गनीम की माँ यह सुन कर पहले तो स्तंभित रही फिर खुशी के आँसू बहाने लगी।

उसने उठ कर फितना को गले लगा लिया और रोने लगी। फितना भी उस से चिमट कर रोने लगी। फिर गनीम की माँ के साथ अलकिंत के पास गई और उसे गले लगा कर प्यार किया। फिर उन दोनों को धीरज बँधाते हुए कहने लगी, यहाँ पर गनीम का जो कुछ धन था उसका नुकसान नहीं हुआ है। वह सुरक्षित है और तुम लोगों को पूरा का पूरा मिलेगा यद्यपि मैं जानती हूँ कि धन से तुम्हारी तसल्ली नहीं होगी क्योंकि तुम गनीम को पाना चाहती हो। भगवान ने चाहा तो वह भी तुम्हें आ मिलेगा। भगवान के लिए कोई बात कठिन नहीं है। जब उसने तुम पर इतनी अनुकंपा की है तो गनीम का तुम से आ मिलना क्या मुश्किल है।

यह लोग यह बातें कर ही रही थीं कि दलाल आ गया और बोला,

कुछ देर पहले मैंने देखा कि एक ऊँटवाला एक निर्बल रोगी को कजावे में रस्सी से बाँध कर यहाँ के बड़े औषधालय में लाया है। मैंने और ऊँटवाले ने उसे ऊँट से कजावे समेत उतारा। हमने बहुत कुछ इसका हाल पूछा परंतु उसने रोने के सिवा और कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उसे नितांत शक्तिहीन देखा तो यहाँ ले आया और उसे अपने बगलवाले मकान में उतारा। मैंने उसे साफ कपड़े पहनाए हैं और बाजार से उसके लिए परहेजी खाना मँगवाया है। खाना खा कर शायद उसे बोलने की ताकत आ जाए। फिर उनका हाल पूछ कर एक हकीम को लाऊँगा कि उसका ठीक इलाज हो सके।

फितना ने यह सुना तो बोल उठी, महोदय,

मुझे भी उस बीमार के पास ले चलिए क्योंकि मैं भी उस रोगी को देखना चाहती हूँ। दलाल फितना को वहाँ ले गया। गनीम की माता ने कहा, इस धर्मात्मा दलाल के पास दूर-दूर से दीन-दुखी आया करते हैं। बेटी, यह रोगी कहीं तुम्हारा भाई ही न हो। फितना जब उस मकान में पहुँची तो देखा कि एक नौजवान मरीज पलंग पर पड़ा है, उसके बदन की हड्डियाँ भर रह गई हैं, उसका चेहरा बिल्कुल पीला और भयानक हो गया है और उसकी आँखों से निरंतर आँसू बह रहे हैं। फिर भी हृदय की भावनाओं ने अनजाने ही जोर मारा तो उसके पास झपट कर पहुँची और गौर से देखा तो पहचाना कि यह गनीम ही है। वह रो कर कहने लगी, हाय गनीम, तुम्हारी यह दशा। गनीम ने आँखें खोलीं और ध्यान से उसे देख कर बोला, अरे सुंदरी, तुम यहाँ। और यह कह कर बेहोश हो गया।

अब दलाल आगे बढ़ा। उसने फितना से कहा,

आप अभी यहाँ से हट जाइए। कहीं ऐसा न हो कि आपको देख कर हर्षातिरेक के मारे मर जाए। फितना चली गई तो दलाल ने गुलाबजल छिड़क कर गनीम को सचेत किया और उसे एक शक्तिवर्धक शर्बत पिलाया। वह होश में आया तो चारों ओर देख कर बोला, सुकुमारी, तुम कहाँ हो? तुम वास्तव में मेरे सामने आई थी या मैंने तुम्हें स्वप्न में देखा था? दलाल बोला, यह स्वप्न नहीं, सत्य था। अब मुझे मालूम हुआ कि तुम्हीं गनीम हो। खलीफा ने मुनादी करवाई है कि तुम्हारा अपराध क्षमा किया गया। तुम धैर्य रखो। तुम्हारी साथिन तुम्हें सब कुछ बताएगी। मैं तुम्हारे लिए भरसक प्रयत्न करूँगा।

फिर दलाल दवा आदि के लिए चला गया।

इधर फितना गनीम की माँ और बहन के पास गई और उसने दोनों को बताया कि आगंतुक रोगी गनीम ही है। गनीम की माँ वह सुन कर अपनी खुशी न सँभाल सकी और बेहोश हो गई। दलाल भी दवा लेने के पहले किसी काम से वहाँ आया था। फितना और दलाल के प्रयत्न से वह होश में आई और कहने लगी कि मुझे तुरंत मेरे बेटे के पास ले चलो। दलाल ने उसे रोका और कहा, यह ठीक नहीं रहेगा। बहुत कमजोर है। तुम्हारी दशा देख कर उसे दुख होगा और उसकी हालत और खराब हो जाएगी। इसलिए तुम अभी उसके पास न जाओ। माँ ने यह बात मान ली।

फितना ने कहा, माता जी, चिंता न करें।

मैं और आप साथ-साथ ही गनीम के पास चलेंगे। मैं इस समय विदा लेती हूँ। महल में जा कर मुझे खलीफा को गनीम के मिलने का समाचार भी देना है। यह कह कर वह खलीफा के महल की ओर चल दी। महल में जा कर उसने खलीफा के पास संदेश भिजवाया कि मैं तुरंत ही आपको एक महत्वपूर्ण संदेश एकांत में देना चाहती हूँ। खलीफा दरबार से उठ कर अंदर आया। फितना ने उसके पाँव चूम कर कहा, सरकार, गनीम और उसकी माँ-बहन सभी मिल गए हैं। खलीफा को यह सुन कर आश्चर्य और हर्ष हुआ। उसने कहा, भाई, तुमने तो कमाल कर दिया। कैसे उन लोगों का पता लगाया? फितना ने दलाल से मिलने और उसके घर जा कर पहले गनीम की माँ-बहन और फिर स्वयं गनीम से मिलने का हाल कहा और बताया कि यद्यपि दोनों महिलाएँ कठिनाइयों के कारण इस समय कृशगात हो रही हैं किंतु बड़ी सुंदर हैं। खलीफा ने मन में निश्चय किया कि उन्हें देखूँगा और उनके सारे अपमान की भरपाई कर दूँगा।

उसने फितना से कहा, मैं तुम्हें गनीम के साथ जरूर ब्याह दूँगा।

अब तुम जाओ उन सब को यहाँ लाओ। दूसरे दिन सुबह फितना अधीरतापूर्वक दलाल के घर पहुँची और गनीम का हाल पूछा। दलाल ने कहा, क्षमादान की बात सुन कर उसकी दशा सँभल गई और अब उसे आपके वियोग के अलावा कोई कष्ट नहीं है। हाँ, वह यह लालसा रखता है कि शीघ्रातिशीघ्र आपको और अपनी माँ-बहन को, जिनका उल्लेख मैंने कर दिया है, देखे।

यह सुन कर फितना पहले अकेली ही गनीम के पास गई,

उसकी माँ और बहन को उसने कमरे के बाहर ही छोड़ दिया और कहा कि मैं बुलाऊँ तब अंदर आना। फितना के साथ दलाल भी था। उसने कहा, दोस्त, यही वह सुंदरी है जिसे देख कर कल तुम अचेत हो गए थे और बाद में कह रहे थे कि शायद मैंने स्वप्न देखा है। अब इससे अच्छी तरह मिलो। गनीम ने फितना की ओर देखा और कहा, मेरी प्यारी मित्र, पहले तुम यह बताओ कि तुम महल छोड़ कर मुझसे मिलने किस तरह आई। मैं तो समझता हूँ कि खलीफा एक क्षण को भी अपने पास से जाने नहीं देता। उसने तुम्हें कैसे आने दिया? फितना ने कहा कि मैं खलीफा की पूर्ण अनुमति से यहाँ आई हूँ और उसने मुझसे यह भी वादा किया है कि तुम्हारे साथ मेरा विवाह करवा देगा।

गनीम यह सुन कर बहुत खुश हुआ और बोला,

तुम सच कहती हो कि खलीफा तुम्हारा मेरे साथ विवाह करा देगा? क्या इतनी सुखदायी बात संभव है? फितना ने कहा, इसमें आश्चर्य की तो बात ही नहीं है। खलीफा ने तुम्हें मरवा देने की जो आज्ञा दी थी वह गलत संदेह के आधार पर थी। जब तुम उसके हाथ न लगे तो उसने दमिश्क के हाकिम को आदेश दिया कि दमिश्कवाला तुम्हारा घर खुदवा कर जमीन के बराबर करवा दिया जाए, तुम्हारी संपत्ति लुटवा दी जाए और तुम्हारी माँ और बहन को तीन दिन तक सड़कों पर कोड़े लगवा कर दमिश्क से निकलवा दिया जाए। बाद में जब उसे मुझ से मालूम हुआ कि उसके सम्मान के ख्याल से तुमने मुझसे संबंध स्थापित नहीं किया था तो वह अपने जल्दबाजी में लिए हुए अन्याय पर लज्जित हुआ और अब सोच रहा है कि जैसे भी हो सके अपने अन्याय का प्रतिकार करे।

गनीम ने विस्तार से अपनी माँ और बहन के बारे में पूछा।

फितना ने बताया तो वह रोने लगा। फितना ने कहा, जो हो गया उसे भूल जाओ। अब रोने की जरूरत नहीं, तुम्हारी माँ और बहन यहीं हैं। गनीम ने कहा कि उन्हें अंदर क्यों नहीं लाती? फितना ने बुलाया तो दोनों अंदर दौड़ी आईं और गनीम को गले लगा कर देर तक रोती रहीं। दलाल ने उन सभी को धीरज बँधाया। फिर गनीम ने अपना पूरा हाल बताया। उसने कहा, खलीफा के भय से बगदाद से भाग कर मैं एक गाँव में जा कर छुपा रहा। वहाँ मैं बीमार हो गया। मैं मसजिद में असहाय पड़ा रहता। एक किसान को मुझ पर दया आई और वह मुझे उठा कर अपने घर ले गया। जहाँ तक उससे हो सका उसने मेरी दवा-दारू कराई। किंतु जब मेरा रोग बढ़ता ही गया तो उसने एक ऊँटवाले को किराया दे कर कहा कि इस रोगी को बगदाद के बड़े शफाखाने में पहुँचा दे जहाँ बड़े-बड़े हकीम इसका इलाज करेंगे।

ऊँटवाले ने मुझे रस्सियों से कजावे से बाँध दिया

क्योंकि मुझ में बैठने की शक्ति भी नहीं थी और मैं ऊँट से गिर जाता। इसके बाद फितना ने सविस्तार अपना हाल बताया कि किस तरह खलीफा ने उसकी काल्पनिक कब्र पर मातम किया, कैसे उसने महल में पत्र भिजवाया, कैसे वह कैद में डाली गई और फिर दुबारा कैसे खलीफा की निगाहों में चढ़ी। गनीम की माँ और बहन ने भी अपना हाल बताया। फिर फितना ने कहा, अब हम सभी को दयामय भगवान को धन्यवाद देना चाहिए कि हम सब पर मुसीबत डाल कर हमें उससे बाहर निकाला।दो-चार दिन में गनीम का रोग पूर्णतः जाता रहा और फितना ने सोचा कि उसे खलीफा के सामने पेश किया जाए, लेकिन इसके लिए गनीम के पास उपयुक्त वस्त्र मौजूद नहीं थे।

फितना फिर महल में जा कर धन लाई

और हजार अशर्फियाँ दलाल को दे कर कहा कि इससे गनीम और उसकी माँ और बहन के लिए राजदरबार में पहने जाने योग्य कपड़े सिलवा दो। दलाल को इन बातों का बहुत ज्ञान था। उसने बढ़िया रेशमी थान खरीदे और तीन दिन के अंदर होशियार दर्जियों से तीनों के लिए कपड़ों के कई जोड़े तैयार करवा दिए।

फिर फितना ने एक दिन खलीफा से इन लोगों की भेंट का निश्चित किया।

उस दिन गनीम और उसकी माँ-बहन नए कपड़े पहन कर दलाल के घर में दरबार में बुलाने की प्रतीक्षा करती रहीं। खलीफा के आदेशानुसार मंत्री जाफर बहुत-से सैनिकों और सरदारों के साथ आया और गनीम का हाल-चाल पूछने के बाद उससे कहा कि मैं तुम्हें और तुम्हारी माँ-बहन को खलीफा के महल में ले जाने के लिए आया हूँ। अतएव गनीम एक बढ़िया घोड़े पर सवार हुआ और फितना ने उसकी माँ और बहन को पर्देदार कजावों में ऊँटों पर बिठाया और एक गुप्त मार्ग से दोनों स्त्रियों को महल में ले आई। गनीम को मंत्री अपने साथ बाजारों से होता हुआ लाया और दरबार में ले गया। दरबार पूरी शान से लगा था।

सारे सरदार और राजदूत उपस्थित थे।

गनीम ने भूमि को चूम कर खलीफा को प्रणाम किया और खलीफा की प्रशंसा में एक स्वरचित कसीदा पढ़ा जिसकी सभी लोगों ने प्रशंसा की।खलीफा ने कहा, गनीम, हम तुम्हें देख कर बहुत खुश हुए। हम चाहते हैं कि तुम हमारे सामने विस्तारपूर्वक बताओ कि तुमने हमारी प्रिय दासी के प्राण किस प्रकार बचाए।

गनीम ने वह सारा वृत्तांत सविस्तार सुनाया।

खलीफा उसे सुन कर प्रसन्न हुआ और आज्ञा दी कि गनीम को भारी खिलअत (सम्मान, वस्त्राभरण) दी जाए। गनीम ने खिलअत पहन कर फिर सलाम किया और कहा, मालिक मैं चाहता हूँ कि आजीवन आपकी चरणसेवा में लगा रहूँ। खलीफा ने यह स्वीकार कर लिया और उसे अपना दरबारी बनाने के साथ एक उच्च पद पर आसीन भी कर दिया। इसके बाद वह दरबार खत्म करके महल में आ गया।

महल में आ कर उसने मंत्री को बुलाया

और कहा कि गनीम को यहाँ ले आओ। उसने फितना को भी बुलाया और उससे कहा कि गनीम की माँ और बहन को यहीं ले आओ। दोनों स्त्रियों ने भूमिचुंबन करके खलीफा का अभिवादन किया। खलीफा ने कहा, मैंने तुम दोनों को बड़ा कष्ट दिया है किंतु अब उस की पूरी भरपाई कर दूँगा। जुबैदा ने फितना से जलन होने के कारण उसके साथ कमीनी हरकत की। उसका दंड यह है कि उसकी यह जलन और बढ़े। मैं गनीम की बहन से विवाह करूँगा। और उसे रानी का पद दूँगा जिससे वह जुबैदा के अधीन न रहे।

गनीम की माँ, तुम्हारी उम्र अभी अधिक नहीं हुई,

तुम हमारे मंत्री जाफर से विवाह कर लो। गनीम, तुम्हें फितना से प्रेम है और मैं इसका विवाह तुम्हारे साथ कराऊँगा। यह कह कर खलीफा ने काजी और गवाहों को बुलाया और तीनों निकाह वहीं पढ़वा दिए। गनीम इसी बात को बहुत समझता कि अलकिंत खलीफा की दासी बन जाए, किंतु खलीफा ने उसे रानी का दरजा दे दिया। इस पर गनीम फूला न समाया। खलीफा ने यह भी आज्ञा दी कि यह सारा वृत्तांत लिखवा कर शाही ग्रंथागार में रखा जाए और उसकी नकलें सारे बड़े देशों को भेजी जाएँ।

मलिका शहरजाद ने गनीम और फितना की कहानी समाप्त की तो दुनियाजाद ने इसकी बड़ी तारीफ की। शहरजाद ने कहा कि अगली कहानी इससे भी अच्छी है। शहरयार ने कहा, मैं भी अगली कहानी सुनना चाहता हूँ, लेकिन अब दिन निकल आया है। अगली कहानी कल सुनाना।

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