Pauranik Charitr Prithu-Kahani

Pauranik Charitr Prithu

ृथु एक सूर्यवंशी राजा थे, जो वेन के पुत्र थे। वाल्मीकि रामायण में इन्हें अनरण्य का पुत्र तथा त्रिशंकु का पिता कहा गया है। ये भगवान विष्णु के अंशावतार थे। स्वयंभुव मनु के वंशज अंग नामक प्रजापति का विवाह मृत्यु की मानसी पुत्री सुनीथा से हुआ था। वेन उनका पुत्र हुआ। सिंहासन पर बैठते ही उसने यज्ञ-कर्मादि बंद कर दिये। त्र+षियों ने मंत्रपूत कुशों से उसे मार डाला। सुनिथा ने पुत्र का शव सुरक्षित रखा, जिसकी दाहिनी जंघा का मंथन करके त्र+षियों ने एक नाटा और छोटा मुखवाला पुरुष उत्पन्न किया। उसने ब्राह्मणों से पूछा, कि मैं क्या करूं ब्राह्मणों ने निषीद (बैठ) कहा। इसलिए उसका नाम निषाद पड़ा। उस निषाद द्वारा वेन के सारे पाप कट गये। बाद में ब्राह्मणों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिसके फलस्वरूप स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। पुरुष का नाम पृथु तथा स्त्री का नाम अर्चि हुआ। अर्चि पृथु की पत्नी हुई। यह लक्ष्मी का अवतार थी। पृथु का राज्याभिषेक हुआ। 

 
 वेन के पापाचरणों से पृथ्वी धन-धान्यहीन हो गई थी। प्रजा का क्लेश मिटाने के लिए पृथु अपना अजगर लेकर पृथ्वी के पीछे पड़े तो वह कांप उठी और गौ-रूप धारण कर शरण के लिए भागी, पर कहीं भी उसे रक्षा नहीं मिली। उसने राजा से प्रार्थना की कि वह अपने उदर में पचे धन-धान्य को दूध के रूप में दे देगी, बशर्ते कि एक बछड़ा दें। स्वायंभुव मनु को बछड़ा बनाकर पृथ्वी दुही गयी। अंत में राजा ने पृथ्वी को कन्या-रूप में ग्रहण किया। पृथु बड़े धर्मात्मा एवं भगवद्भक्त थे। इन्होंने ब्रह्मावर्त प्रदेश में पुण्यतोया सरस्वती के तट पर सौ यज्ञ किये। सौवां यज्ञ चलते समय ईर्ष्यालु इंद्र ने इनका अश्व चुरा लिया तो ये कुपित हों गये और धनुष पर अपना बाण चढ़ा लिया। त्र+षियों के मना करने पर भी वे इंद्र को होम करने लगे तो ब्रह्मा ने उन्हें रोका। इस पर धर्मात्मा पृथु ने अपना यज्ञ ही रोक लिया। पृथु ने प्रयाग को निवासभूमि बना लिया। स्वयं सनकादि इनके यहां उपस्थित हुए। 
 
 अंतिम दिनों में पृथु अर्चि सहित तपस्या के लिए वन में चले गये। वहां योग-ध्यान में शरीर-त्याग किया। पृथु तथा अर्चि के पांच पुत्र हुए थे – विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक। अर्चि पति की चिता पर चढ़कर सती हुई थी। 
 
 एक पृथु था वृष्णिवंश के चित्ररथ का पुत्र, जो विदूर का भाई था। कृष्ण ने इसे मथुरापुरी के उत्तरी द्वार की रक्षा पर नियुक्त किया था। प्रभास तीर्थ में यादव-वंश के अंत के समय यह भी परस्पर कलह में मारा गया।

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